महाराष्ट्र सरकार दही हांडी उत्सव को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की तैयारी में जुट गई है। सरकार की योजना इस पारंपरिक उत्सव को UNESCO की हेरिटेज लिस्ट में शामिल कराने के लिए प्रयास करने की है। इसके साथ ही दही हांडी के दौरान ऊंचे मानव पिरामिड बनाने वाले गोविंदाओं को स्पेन भेजने की भी योजना बनाई जा रही है, ताकि वहां महाराष्ट्र की इस अनोखी और पारंपरिक संस्कृति का प्रदर्शन किया जा सके।
महाराष्ट्र में दही हांडी का उत्सव जन्माष्टमी के मौके पर बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दौरान गोविंदा की टीमें एक-दूसरे के ऊपर चढ़कर मानव पिरामिड बनाती हैं और ऊंचाई पर लटकी दही हांडी को फोड़ने का प्रयास करती हैं। यह आयोजन केवल धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र की लोक संस्कृति, सामूहिक भागीदारी और पारंपरिक उत्सव का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
महाराष्ट्र सरकार अब इस उत्सव को राज्य और देश की सीमाओं से बाहर पहचान दिलाने की दिशा में काम करना चाहती है। इसी योजना के तहत दही हांडी को UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी सूची में शामिल कराने के लिए प्रयास किए जाने की बात सामने आई है। सरकार का मानना है कि इस परंपरा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विशेषताओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किया जा सकता है।
महाराष्ट्र के सांस्कृतिक मामलों के मंत्री आशीष शेलार ने रविवार को इस योजना की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सरकार दही हांडी उत्सव को UNESCO तक ले जाने के लिए प्रयास करेगी। इसके साथ ही गोविंदा पथकों को विदेश में ले जाकर इस परंपरा का प्रदर्शन कराने की योजना पर भी काम किया जा रहा है।
स्पेन में गोविंदाओं के प्रदर्शन की योजना इस पूरी पहल का खास हिस्सा है। अगर योजना आगे बढ़ती है तो महाराष्ट्र के गोविंदा वहां मानव पिरामिड बनाकर दही हांडी की परंपरा का प्रदर्शन कर सकते हैं। इससे विदेशी दर्शकों को महाराष्ट्र की लोक संस्कृति और इस उत्सव से जुड़ी परंपराओं को करीब से समझने का अवसर मिलेगा।
दही हांडी के आयोजन में गोविंदा पथकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। कई बार इन टीमों में बड़ी संख्या में युवा शामिल होते हैं और वे कई स्तरों वाला मानव पिरामिड बनाकर हांडी तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। इसके लिए टीमवर्क, संतुलन और आपसी तालमेल की जरूरत होती है। यही वजह है कि दही हांडी को केवल धार्मिक उत्सव के बजाय सामूहिक सांस्कृतिक परंपरा के रूप में भी देखा जाता है।
महाराष्ट्र में दही हांडी के दौरान अलग-अलग इलाकों में बड़े आयोजन होते हैं। इन आयोजनों में संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ गोविंदा पथकों के बीच हांडी फोड़ने की प्रतियोगिताएं भी होती हैं। समय के साथ इस उत्सव ने महाराष्ट्र के बाहर भी अपनी पहचान बनाई है और देश के कई दूसरे हिस्सों में भी दही हांडी के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी पहचान किसी परंपरा को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालांकि किसी परंपरा को इस तरह की सूची में शामिल कराने के लिए निर्धारित प्रक्रिया और आवश्यक मानकों को पूरा करना होता है। महाराष्ट्र सरकार की योजना अब इसी दिशा में आगे बढ़ने की है।
स्पेन में गोविंदाओं को भेजने की योजना भी महाराष्ट्र की सांस्कृतिक कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है। इससे राज्य की पारंपरिक संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित करने का मौका मिलेगा। साथ ही विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय और अन्य लोगों के बीच महाराष्ट्र की लोक परंपराओं को लेकर रुचि बढ़ सकती है।
सरकार की इस पहल का उद्देश्य दही हांडी को केवल एक स्थानीय उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान के हिस्से के तौर पर दुनिया के सामने पेश करना है। अगर UNESCO की प्रक्रिया में महाराष्ट्र सरकार सफल होती है, तो यह राज्य की सांस्कृतिक विरासत के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।
फिलहाल दही हांडी को UNESCO तक ले जाने और गोविंदाओं को स्पेन भेजने की योजना शुरुआती स्तर पर है। आने वाले समय में सरकार की ओर से इसकी प्रक्रिया और कार्यक्रम को लेकर अधिक जानकारी सामने आ सकती है। लेकिन इतना तय है कि महाराष्ट्र सरकार इस पारंपरिक उत्सव को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान दिलाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।


