हिमालयी क्षेत्रों में बदलते मौसम और प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला एक बार फिर गंभीर चिंता का विषय बन गया है। तिब्बत-नेपाल सीमावर्ती क्षेत्र में आई हालिया भीषण बाढ़ ने न केवल जान-माल का नुकसान किया है, बल्कि भविष्य के लिए कई बड़े सवाल भी खड़े कर दिए हैं। इस आपदा के वास्तविक कारणों, इसके प्रभाव और भविष्य के खतरों को समझने के लिए नेपाल सरकार ने एक बेहद अहम कदम उठाया है। नेपाल के ऊर्जा, जल संसाधन और सिंचाई मंत्रालय ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सात सदस्यों की एक उच्च स्तरीय एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया है। इस विशेष जांच टीम का नेतृत्व जल नीति और गवर्नेंस के जाने-माने विशेषज्ञ देवेश बेलबासे कर रहे हैं। इस कमेटी को दो महीने के भीतर अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।
कमेटी में अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल किए गए हैं ताकि आपदा का हर पहलू से वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सके। इसमें हाइड्रोलॉजिस्ट नरेंद्र मान शाक्य, ग्लेशियोलॉजिस्ट रिजन भक्त कायस्थ, रिमोट-सेंसिंग एक्सपर्ट उत्तम बाबू श्रेष्ठ, जियोलॉजिस्ट मेघराज धिताल, हाइड्रोपावर इंफ्रास्ट्रक्चर एक्सपर्ट हरि पंडित और आपदा-जोखिम प्रबंधन विशेषज्ञ अनिल पोखरेल शामिल हैं। यह बहुआयामी टीम इस बात का संकेत है कि सरकार इसे सिर्फ एक सामान्य जल प्रलय नहीं मान रही है, बल्कि इसके पीछे छिपे जटिल वैज्ञानिक और भू-वैज्ञानिक कारणों की गहराई तक जाना चाहती है।
मंत्रालय के प्रवक्ता मोहन कुमार शाक्य ने इस जांच के प्रमुख उद्देश्यों को रेखांकित किया है। कमेटी बाढ़ के संभावित शुरुआती स्रोत से लेकर भोटेकोशी और ल्हेन्डे नदी प्रणाली तथा उसके निचले तटीय क्षेत्रों का जमीनी दौरा करेगी। इस अध्ययन का उद्देश्य केवल वैज्ञानिक वजहों या बाढ़ के घटनाक्रम को समझना ही नहीं है, बल्कि भविष्य में इस प्रकार की त्रासदियों से जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य प्रमुख ऊर्जा अवसंरचनाओं को बचाना भी है। इस जांच प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की कमी न रहे, इसके लिए ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी और अत्याधुनिक रिमोट-सेंसिंग तकनीकों का सहारा लिया जाएगा।
इस पूरे अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका दृष्टिकोण है। अधिकारी शाक्य के अनुसार, कमेटी इस पूरी घटना को महज़ अत्यधिक बारिश या अचानक आई बाढ़ के रूप में नहीं देखेगी। इसे एक ‘कैस्केडिंग डिज़ास्टर’ यानी एक के बाद एक होने वाली आपदाओं की कड़ी के रूप में आंका जाएगा। हिमालयी इलाकों में ऐसा अक्सर देखा जाता है जब भू-वैज्ञानिक बदलाव, ग्लेशियर का पिघलना या खिसकना और जल-विज्ञान से जुड़े खतरे एक साथ या एक-दूसरे के प्रभाव से सक्रिय हो जाते हैं।
हिमालयी क्षेत्र पहले से ही जलवायु परिवर्तन और भौगोलिक संवेदनशीलता के कारण बेहद नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। इस प्रकार की वैज्ञानिक जांच न केवल नेपाल के लिए, बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। जांच से मिलने वाले आंकड़े और निष्कर्ष भविष्य में हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के निर्माण और नदियों के आसपास बसे आबादी वाले क्षेत्रों को सुरक्षित रखने में मददगार साबित होंगे। दो महीने बाद आने वाली यह रिपोर्ट यह दिशा तय करेगी कि आने वाले समय में प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए हमारी तैयारी कितनी मजबूत और वैज्ञानिक होगी।


