अमेरिकी सेना की तैयारियों को लेकर एक वरिष्ठ अमेरिकी सैन्य अधिकारी के बयान ने नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी नॉर्दर्न कमांड के डिप्टी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जोसेफ जारार्ड ने बड़े पैमाने पर होने वाले ड्रोन हमलों से निपटने की अमेरिका की क्षमता को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अलबामा में आयोजित स्पेस एंड मिसाइल डिफेंस सिम्पोजियम में उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास पर्याप्त सेंसर और ऐसे हथियार यानी ‘इफेक्टर्स’ नहीं हैं, जिनकी मदद से बड़ी संख्या में आने वाले ड्रोन के झुंड को रोका जा सके।
जारार्ड का यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब आधुनिक युद्ध में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। कम लागत वाले ड्रोन बड़ी संख्या में इस्तेमाल किए जा सकते हैं और इन्हें रोकने के लिए कई बार बेहद महंगे इंटरसेप्टर या दूसरे रक्षा प्रणालियों की जरूरत पड़ती है। यही अंतर दुनिया की बड़ी सैन्य शक्तियों के सामने एक नई चुनौती बनकर उभर रहा है।
अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक अगर किसी देश की ओर से एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन भेजे जाते हैं तो मौजूदा सेंसर और हथियार प्रणालियों पर भारी दबाव पड़ सकता है। किसी भी हवाई खतरे को रोकने के लिए सबसे पहले उसका पता लगाना जरूरी होता है। इसके बाद उसे निष्क्रिय करने के लिए उपयुक्त हथियार या दूसरी तकनीक की आवश्यकता होती है। जारार्ड के बयान में इन्हीं दोनों क्षेत्रों में पर्याप्त क्षमता की कमी की ओर इशारा किया गया है।
इस खुलासे का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि अमेरिका दुनिया की सबसे आधुनिक सैन्य तकनीक रखने वाले देशों में शामिल है। इसके बावजूद अगर बड़े पैमाने पर ड्रोन हमलों के सामने पर्याप्त संख्या में सेंसर और इफेक्टर्स उपलब्ध नहीं हैं, तो यह अमेरिकी रक्षा रणनीति के सामने एक गंभीर चुनौती मानी जा सकती है।
ईरान के साथ हालिया संघर्ष के संदर्भ में भी इस मुद्दे पर चर्चा तेज हुई है। इस दौरान मिसाइलों और ड्रोन के इस्तेमाल ने हवाई रक्षा प्रणालियों की क्षमता और उनकी लागत को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। अमेरिका और उसके सहयोगियों को एक तरफ आने वाले खतरों को रोकना होता है, तो दूसरी तरफ बेहद महंगे इंटरसेप्टर और प्रिसीजन हथियारों के इस्तेमाल से अपने भंडार पर पड़ने वाले दबाव को भी देखना पड़ता है।
यही वजह है कि आधुनिक युद्ध में अब सिर्फ यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं रह गया है कि किसी देश के पास कितने शक्तिशाली हथियार हैं। सवाल यह भी है कि वह देश कितनी बड़ी संख्या में आने वाले कम लागत वाले खतरों का लगातार मुकाबला कर सकता है। अगर हमला करने वाला पक्ष सस्ते ड्रोन की बड़ी संख्या इस्तेमाल करता है और उन्हें रोकने के लिए महंगे हथियार खर्च होते हैं, तो लंबे संघर्ष में यह रणनीतिक और आर्थिक चुनौती बन सकती है।
रूस और चीन जैसे देशों के लिए भी इस तरह के अमेरिकी बयान का रणनीतिक महत्व हो सकता है। दोनों देश ड्रोन तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और लंबी दूरी के हथियारों के क्षेत्र में लगातार अपनी क्षमताएं विकसित कर रहे हैं। हालांकि किसी अमेरिकी अधिकारी के बयान के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि अमेरिका अपने हवाई क्षेत्र की रक्षा करने में असमर्थ है। बयान मुख्य रूप से बड़े पैमाने पर होने वाले ड्रोन हमलों के लिए पर्याप्त संख्या में सेंसर और इफेक्टर्स की उपलब्धता से जुड़ी चिंता को दर्शाता है।
अमेरिकी सेना के सामने एक और चुनौती हथियारों के भंडार को बनाए रखने की है। महंगे इंटरसेप्टर का इस्तेमाल लगातार बढ़ने पर उनकी जगह नए हथियार तैयार करना और सैन्य भंडार को दोबारा भरना जरूरी हो जाता है। इसके लिए समय, उत्पादन क्षमता और भारी आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है।
ड्रोन युद्ध ने दुनिया की सैन्य रणनीति को तेजी से बदल दिया है। पहले जिस तरह के हमलों को रोकने के लिए बेहद महंगी मिसाइल रक्षा प्रणालियों पर निर्भरता थी, अब उनके साथ कम लागत वाली एंटी-ड्रोन तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, लेजर और दूसरे विकल्पों पर भी जोर बढ़ रहा है।
लेफ्टिनेंट जनरल जोसेफ जारार्ड का बयान इसी बदलती युद्ध रणनीति की तरफ इशारा करता है। अमेरिका के सामने चुनौती केवल शक्तिशाली हथियार रखने की नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में आने वाले सस्ते और तेजी से विकसित हो रहे ड्रोन खतरों से लंबे समय तक निपटने की है।
फिलहाल उनके बयान ने अमेरिकी रक्षा तैयारियों को लेकर बहस जरूर तेज कर दी है। रूस और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी देश भी इस तरह के बयानों का विश्लेषण कर सकते हैं और भविष्य की अपनी सैन्य रणनीतियों में ड्रोन और बड़े पैमाने पर हमलों की भूमिका को और अधिक महत्व दे सकते हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि अमेरिका इस चुनौती से निपटने के लिए अपनी सेंसर क्षमता, एंटी-ड्रोन हथियारों और इंटरसेप्टर के उत्पादन को किस तरह मजबूत करता है।


