अमेरिका से आई एक बड़ी आर्थिक खबर ने बाजारों और आम लोगों का ध्यान खींचा है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत यानी 25 आधार अंक की बढ़ोतरी की है। इस फैसले के बाद अमेरिका में कर्ज लेना महंगा होने की आशंका बढ़ गई है। इसका असर घर खरीदने, वाहन के लिए लोन लेने और कारोबार के लिए कर्ज जुटाने वालों पर पड़ सकता है।
दी गई जानकारी के मुताबिक, फेडरल रिजर्व ने बुधवार को ब्याज दर बढ़ाकर 3.75 से 4 प्रतिशत के बीच कर दी। बताया गया है कि तीन साल से ज्यादा समय के बाद यह पहली बढ़ोतरी है। केंद्रीय बैंक के सामने इस समय महंगाई को काबू में रखने और आर्थिक गतिविधियों को बनाए रखने की चुनौती है।
फेड का कहना है कि आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं, लेकिन महंगाई अब भी उसके 2 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर है। इसके अलावा, दुनिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण आर्थिक अनिश्चितता भी बनी हुई है। ऐसे हालात में ब्याज दरों को लेकर लिया गया फैसला आने वाले समय में कारोबार और उपभोक्ताओं के खर्च पर असर डाल सकता है।
इस फैसले के पीछे कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को भी अहम वजह बताया जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है। दी गई जानकारी के अनुसार, ब्रेंट क्रूड मंगलवार को करीब 109 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था।
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। ईंधन महंगा होने से परिवहन और उत्पादन की लागत भी बढ़ सकती है। कंपनियों का खर्च बढ़ने पर कई वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। यही वजह है कि ऊर्जा की कीमतों में उछाल महंगाई को लेकर चिंता बढ़ा रहा है।
अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में भी तेजी दर्ज किए जाने की बात कही गई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, पेट्रोल की औसत कीमत 4.36 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है। एक सप्ताह में इसमें 14 सेंट की बढ़ोतरी बताई गई है, जबकि पिछले महीने औसत कीमत करीब 4.06 डॉलर प्रति गैलन थी।
डीजल की कीमतों को लेकर भी चिंता जताई गई है। इसकी औसत कीमत 6.31 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंचने का दावा किया गया है। डीजल का इस्तेमाल सामान ढोने वाले ट्रकों में बड़े पैमाने पर होता है। ऐसे में इसकी कीमत बढ़ने से फल-सब्जियों, निर्माण सामग्री और अन्य वस्तुओं की ढुलाई महंगी हो सकती है। इसका असर आखिरकार उपभोक्ताओं तक भी पहुंच सकता है।
महगाई के आंकड़े भी दबाव की ओर इशारा करते हैं। दी गई जानकारी के अनुसार, अगस्त में अमेरिकी उपभोक्ता कीमतों में 0.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जो चार महीने में सबसे ज्यादा बताई गई है। सालाना महंगाई दर 3.4 प्रतिशत रही। नए शुल्क और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े निवेश पर बढ़ता खर्च भी कीमतों पर दबाव डालने वाले कारकों में शामिल बताया गया है। हालांकि, रोजगार बाजार अपेक्षाकृत मजबूत बना हुआ है।
फेड अधिकारियों के ताजा अनुमानों के अनुसार, इस साल एक और ब्याज दर बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है। इसके बाद अगले साल दरों को मौजूदा स्तर पर बनाए रखने का अनुमान है। इससे संकेत मिलता है कि महंगाई पर नियंत्रण केंद्रीय बैंक की प्राथमिकताओं में बना हुआ है।
वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ब्याज दरों में कटौती की मांग करते रहे हैं। दी गई जानकारी के मुताबिक, फैसले के बाद उन्होंने कहा कि अमेरिका में ब्याज दर एक प्रतिशत या उससे कम होनी चाहिए। उन्होंने जल्द दरें घटाने की मांग भी दोहराई।
फेड की मौजूदा नीति को लेकर आने वाले समय में बहस जारी रह सकती है। एक ओर महंगाई और ईंधन की कीमतें चिंता का विषय हैं, तो दूसरी ओर ऊंची ब्याज दरें कर्ज लेने वालों और कारोबार पर अतिरिक्त बोझ डाल सकती हैं। ऐसे में फेड के अगले फैसले इस बात पर निर्भर करेंगे कि महंगाई, रोजगार और आर्थिक विकास के आंकड़े किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।


