कावेरी नदी के पानी को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट सोमवार, 17 अगस्त को तमिलनाडु सरकार की उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें कर्नाटक को तमिलनाडु के हिस्से का कावेरी नदी का पानी तत्काल छोड़ने का निर्देश देने की मांग की गई है। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ करेगी।
तमिलनाडु सरकार का आरोप है कि कर्नाटक की ओर से कावेरी जल विनियमन समिति यानी CWRC के निर्देशों के बावजूद उसके हिस्से का पर्याप्त पानी नहीं छोड़ा जा रहा है। राज्य सरकार का कहना है कि कावेरी नदी का पानी तमिलनाडु के लिए कृषि और सिंचाई के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में पानी की कमी का सीधा असर किसानों और फसलों पर पड़ सकता है।
तमिलनाडु ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि कर्नाटक को निर्धारित अनुपात के आधार पर राज्य के हिस्से का पानी तुरंत जारी करने का निर्देश दिया जाए। राज्य सरकार का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में उसे अपने हिस्से का पानी नहीं मिल रहा है और इस मामले में तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत है।
यह विवाद कावेरी जल विनियमन समिति और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के निर्देशों से भी जुड़ा हुआ है। तमिलनाडु का कहना है कि संबंधित प्राधिकरणों की ओर से पानी छोड़ने को लेकर निर्देश जारी किए गए थे, लेकिन जमीन पर पानी का प्रवाह तय मात्रा के अनुरूप नहीं रहा। इसी आधार पर तमिलनाडु ने शीर्ष अदालत का रुख किया है।
राज्य सरकार के मुताबिक, कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमा पर स्थित बिलिगुंडलु में पानी का प्रवाह निर्धारित मात्रा से काफी कम रहा। तमिलनाडु का दावा है कि इससे उसके हिस्से में आने वाले पानी की उपलब्धता प्रभावित हुई है। राज्य सरकार ने कर्नाटक के जलाशयों में उपलब्ध पानी का भी हवाला देते हुए कहा है कि वहां पर्याप्त जल भंडार मौजूद होने के बावजूद तमिलनाडु को उसका हिस्सा नहीं मिल रहा है।
कावेरी जल विवाद दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से चला आ रहा संवेदनशील मुद्दा है। कावेरी नदी कर्नाटक से निकलकर तमिलनाडु की ओर बहती है और दोनों राज्यों के लाखों किसानों की खेती काफी हद तक इसके पानी पर निर्भर करती है। बारिश के मौसम में जब जलाशयों में पानी की स्थिति बदलती है, तब दोनों राज्यों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर विवाद और बढ़ जाता है।
इस मामले में कर्नाटक का पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा। कर्नाटक पहले भी पानी छोड़ने से जुड़े निर्देशों पर अपनी आपत्ति जताता रहा है। राज्य का तर्क रहा है कि उसके अपने किसानों और पीने के पानी की जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के सामने दोनों राज्यों की मांगों और मौजूदा जल स्थिति के आधार पर फैसला लेने की चुनौती होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले कहा था कि तमिलनाडु सरकार और द्रविड़ मुनेत्र कषगम यानी DMK समेत अन्य पक्षों की ओर से दायर याचिकाओं पर 17 अगस्त को सुनवाई की जाएगी। अब सोमवार की सुनवाई में अदालत दोनों पक्षों की दलीलें सुन सकती है और कावेरी जल छोड़ने को लेकर आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है।
तमिलनाडु सरकार को उम्मीद है कि अदालत कर्नाटक को तत्काल पानी छोड़ने का आदेश देगी। वहीं कर्नाटक की ओर से जल उपलब्धता और अपने राज्य की जरूरतों को लेकर अपना पक्ष रखा जाएगा। इस सुनवाई के परिणाम का असर दोनों राज्यों के किसानों और कावेरी नदी के पानी के प्रबंधन पर पड़ सकता है।
फिलहाल सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की सोमवार को होने वाली सुनवाई पर है। अदालत के निर्देश से यह तय हो सकता है कि मौजूदा परिस्थितियों में कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए कितना पानी छोड़ना होगा और दोनों राज्यों के बीच कावेरी जल बंटवारे को लेकर आगे की व्यवस्था किस तरह लागू होगी।


