गोरखपुर की चिल्लूपार विधानसभा सीट पर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज होती दिखाई दे रही है। बसपा ने अस्मिता चंद को अपना प्रत्याशी घोषित कर इस सीट के राजनीतिक समीकरण को एक नया मोड़ दे दिया है। चिल्लूपार की राजनीति में लंबे समय से प्रभाव रखने वाले ब्राह्मण और ठाकुर धड़ों के बीच वर्चस्व की लड़ाई अब एक बार फिर चर्चा में है। बसपा के इस फैसले के बाद मुकाबला सिर्फ पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से भी दिलचस्प होता दिखाई दे रहा है।
चिल्लूपार सीट को पूर्वांचल की उन विधानसभा सीटों में गिना जाता है, जहां चुनावी राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरण और राजनीतिक प्रतिष्ठा से प्रभावित रही है। यहां पूर्वांचल के चर्चित नेता स्वर्गीय पंडित हरिशंकर तिवारी का राजनीतिक प्रभाव लंबे समय तक देखने को मिला। यही वजह है कि चिल्लूपार को अक्सर ‘तिवारी हाता’ की सियासी विरासत से जोड़कर देखा जाता है। दूसरी तरफ गोरखनाथ मठ का प्रभाव भी पूर्वांचल की राजनीति में काफी महत्वपूर्ण रहा है और इसे ठाकुर नेतृत्व के मजबूत केंद्र के रूप में देखा जाता रहा है।
इसी वजह से चिल्लूपार में ‘हाता बनाम मठ’ की राजनीतिक चर्चा लंबे समय से होती रही है। एक तरफ ब्राह्मण नेतृत्व और दूसरी तरफ ठाकुर नेतृत्व का प्रभाव इस सीट के चुनावी समीकरण को खास बनाता रहा है। अब 2027 के चुनाव से पहले बसपा के प्रत्याशी चयन ने इसी पुराने समीकरण को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
बसपा की ओर से अस्मिता चंद को प्रत्याशी बनाए जाने के बाद पार्टी की रणनीति को ठाकुर-दलित समीकरण के तौर पर देखा जा रहा है। बहुजन समाज पार्टी के लिए दलित वोट उसका पारंपरिक आधार रहा है और अगर इसके साथ ठाकुर मतदाताओं के एक हिस्से को जोड़ने में पार्टी सफल होती है, तो चिल्लूपार में मुकाबला काफी दिलचस्प हो सकता है। हालांकि चुनाव के दौरान जातीय समीकरण कितने प्रभावी होंगे, यह स्थानीय उम्मीदवारों, संगठन और मतदाताओं के रुझान पर भी निर्भर करेगा।
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और बीजेपी के संभावित उम्मीदवारों को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। मौजूदा समीकरणों में दोनों दलों की नजर ब्राह्मण मतदाताओं पर रहने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में बसपा का ठाकुर चेहरा सामने लाना मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। अगर तीनों प्रमुख दल अलग-अलग सामाजिक समीकरणों के साथ मैदान में उतरते हैं, तो चिल्लूपार का चुनाव सिर्फ उम्मीदवारों की लोकप्रियता नहीं बल्कि वोटों के सामाजिक ध्रुवीकरण पर भी निर्भर कर सकता है।
हालांकि चिल्लूपार में सिर्फ जातीय समीकरण ही चुनावी परिणाम तय नहीं करते। क्षेत्र के विकास, रोजगार, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय मुद्दे भी मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे। इसके अलावा उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि और क्षेत्र में उसकी सक्रियता भी चुनाव के दौरान बड़ा असर डाल सकती है। इसलिए अभी से किसी एक सामाजिक समीकरण को जीत की गारंटी मानना जल्दबाजी होगी।
2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए चिल्लूपार में राजनीतिक गतिविधियां आने वाले महीनों में और तेज होने की उम्मीद है। बसपा ने अपना पत्ता खोलकर मुकाबले की दिशा में पहला बड़ा संकेत दे दिया है। अब नजर इस बात पर होगी कि बीजेपी और समाजवादी पार्टी किस चेहरे को मैदान में उतारती हैं और वे बसपा के ठाकुर-दलित समीकरण का मुकाबला किस रणनीति से करती हैं।
कुल मिलाकर चिल्लूपार की राजनीति एक बार फिर पूर्वांचल के पुराने सियासी संघर्षों की तरफ लौटती नजर आ रही है। ‘तिवारी हाता’ की ब्राह्मण सियासत और ‘गोरखनाथ मठ’ से जुड़े ठाकुर प्रभाव के बीच बसपा ने अपना अलग सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश की है। अब असली तस्वीर चुनावी मैदान में उम्मीदवारों की अंतिम घोषणा और जनता के मूड से साफ होगी। फिलहाल इतना तय है कि 2027 के चुनाव में चिल्लूपार सीट पूर्वांचल की सबसे चर्चित और दिलचस्प सीटों में शामिल हो सकती है।


