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India-China Trade ने तोड़ा रिकॉर्ड! द्विपक्षीय व्यापार ₹127.7 अरब डॉलर पहुंचा, लेकिन भारत का घाटा भी बढ़ा

भारत और चीन के बीच व्यापार को लेकर एक बड़ी तस्वीर सामने आई है। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 7.9 प्रतिशत बढ़कर 127.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यानी भारत और चीन के बीच कारोबार का आकार लगातार बढ़ रहा है। लेकिन इसके साथ ही भारत की चिंता भी बढ़ी है, क्योंकि व्यापार बढ़ने के बावजूद चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा भी काफी ज्यादा हो गया है।

आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 118.39 अरब डॉलर था, जो 2025-26 में बढ़कर 127.7 अरब डॉलर हो गया। यानी एक साल के भीतर व्यापार में करीब 9.3 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई। चीन इस अवधि में भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा।

लेकिन इस पूरी तस्वीर का दूसरा पहलू भारत का बढ़ता व्यापार घाटा है। वित्त वर्ष 2025-26 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 99.19 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इससे पहले 2024-25 में यह करीब 85 अरब डॉलर था। यानी सिर्फ एक साल में व्यापार घाटे में भी काफी बड़ी बढ़ोतरी देखने को मिली है।

भारत ने चीन को अपना निर्यात जरूर बढ़ाया है। वित्त वर्ष 2025-26 में चीन को भारत का निर्यात 36.62 प्रतिशत बढ़कर 19.47 अरब डॉलर हो गया, जबकि 2024-25 में यह आंकड़ा 14.25 अरब डॉलर था। यानी भारतीय सामानों का चीन को निर्यात बढ़ा है, लेकिन इसके मुकाबले चीन से भारत का आयात कहीं ज्यादा है।

चीन से भारत का आयात वित्त वर्ष 2025-26 में 16 प्रतिशत बढ़कर 131.62 अरब डॉलर हो गया। इससे साफ है कि दोनों देशों के बीच व्यापार में सबसे बड़ा अंतर आयात और निर्यात के बीच है। भारत चीन से बड़े पैमाने पर सामान और औद्योगिक उत्पाद खरीदता है, जबकि चीन को भारत का निर्यात उसके मुकाबले काफी कम है।

भारत के कुल वस्तु आयात में चीन की हिस्सेदारी करीब 17 प्रतिशत रही। इससे यह भी पता चलता है कि भारतीय बाजार और उद्योग के लिए चीन कितना महत्वपूर्ण सप्लायर बन चुका है। वहीं भारत के कुल निर्यात में चीन की हिस्सेदारी करीब 4.4 प्रतिशत रही।

चीन से आने वाले सामानों में सबसे बड़ा हिस्सा औद्योगिक उत्पादों का है। वर्ष 2025 में चीन से भारत के आयात में करीब 98.5 प्रतिशत हिस्सा औद्योगिक उत्पादों का बताया गया है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, कंप्यूटर, ऑर्गेनिक केमिकल्स और कई तरह के औद्योगिक कच्चे माल शामिल हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक चीन से भारत के करीब 66 प्रतिशत आयात इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, कंप्यूटर और ऑर्गेनिक केमिकल्स जैसी श्रेणियों में आते हैं। इनकी कीमत करीब 82.6 अरब डॉलर बताई गई है। यही वह क्षेत्र है जहां भारत की चीन पर निर्भरता सबसे ज्यादा दिखाई देती है।

इलेक्ट्रॉनिक्स के आयात में चीन की हिस्सेदारी करीब 43 प्रतिशत है। मशीनरी और कंप्यूटर के आयात में चीन की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत और ऑर्गेनिक केमिकल्स में करीब 44 प्रतिशत बताई गई है। इसका मतलब यह है कि भारत सिर्फ तैयार सामान के लिए ही चीन पर निर्भर नहीं है, बल्कि देश के विनिर्माण क्षेत्र के लिए जरूरी कच्चे माल और कलपुर्जों की सप्लाई में भी चीन की बड़ी भूमिका है।

इन सामानों में इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी, सोलर मॉड्यूल, सक्रिय औषधीय सामग्री यानी API और विशेष रसायन शामिल हैं। इन चीजों को अचानक दूसरे देशों से खरीदना आसान नहीं है, क्योंकि भारतीय उद्योग की कई सप्लाई चेन लंबे समय से चीन से जुड़ी हुई हैं।

यही वजह है कि भारत के सामने एक बड़ी चुनौती है। एक तरफ भारत अपने निर्यात को बढ़ाना चाहता है और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ कई जरूरी औद्योगिक सामानों के लिए चीन से आयात पर निर्भरता बनी हुई है। वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक भारत का व्यापार घाटा मुख्य रूप से कच्चे माल, मध्यवर्ती सामान और पूंजीगत वस्तुओं के आयात की वजह से है।

इन सामानों का इस्तेमाल भारत में तैयार उत्पाद बनाने के लिए किया जाता है और फिर उनमें से कई उत्पादों को दूसरे देशों में निर्यात भी किया जाता है। यानी चीन से होने वाला हर आयात सिर्फ अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने वाला सामान नहीं है, बल्कि उसका एक बड़ा हिस्सा भारतीय उद्योग की उत्पादन प्रक्रिया में इस्तेमाल होता है।

चीनी निवेश की बात करें तो अप्रैल 2000 से मार्च 2026 के बीच भारत को चीन से करीब 2.51 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मिला है। हालांकि भारत ने चीन समेत जमीन से सीमा साझा करने वाले देशों के निवेश को लेकर सुरक्षा और रणनीतिक चिंताओं के चलते अलग-अलग नियम बनाए हुए हैं।

कुल मिलाकर भारत-चीन व्यापार की तस्वीर काफी जटिल है। दोनों देशों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ रहा है, भारत का निर्यात भी बढ़ रहा है, लेकिन आयात और व्यापार घाटे का अंतर अभी भी बहुत बड़ा है। ऐसे में आने वाले समय में भारत के लिए चुनौती सिर्फ चीन के साथ व्यापार बढ़ाना नहीं, बल्कि निर्यात को और मजबूत करना और जरूरी औद्योगिक सप्लाई चेन में अपनी निर्भरता को संतुलित करना भी होगी।

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