“ऐसा जवाब देंगे कि याद रखोगे!” यमन के हूती विद्रोहियों ने पाकिस्तान और तुर्की को ऐसी चेतावनी दी है, जिसने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच नई चर्चा छेड़ दी है। पाकिस्तान के परमाणु हथियारों और सेना को लेकर पहले से चल रही चर्चाओं के बीच अब हूती नेता की धमकी सुर्खियों में है। आखिर क्या कहा गया है और क्यों इस बयान को लेकर हलचल मची हुई है?
यमन के हूती संगठन अंसार अल्लाह के राजनीतिक ब्यूरो के सदस्य और धमार के गवर्नर मोहम्मद अल-बुखैती ने पाकिस्तान और तुर्की को लेकर कड़ा बयान दिया है। एक टेलीविजन कार्यक्रम में बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि यदि ये दोनों देश यमन के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में शामिल होते हैं, तो हूती उनके खिलाफ सख्त कदम उठाएंगे।
अल-बुखैती ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि यदि पाकिस्तान और तुर्की सऊदी अरब का साथ देते हुए यमन में सैन्य हस्तक्षेप करते हैं, तो उन्हें कड़ा जवाब दिया जाएगा। उन्होंने इस संभावित भागीदारी को हूती संगठन के खिलाफ कार्रवाई के रूप में देखते हुए चेतावनी दी। हालांकि, यह बयान एक संभावित सैन्य हस्तक्षेप की स्थिति को लेकर दिया गया है। इससे यह साबित नहीं होता कि पाकिस्तान या तुर्की ने यमन में सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी है।
दरअसल, यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच तनाव का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। क्षेत्र में हमलों और जवाबी कार्रवाई की आशंकाओं ने सुरक्षा स्थिति को संवेदनशील बना दिया है। इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान और तुर्की का नाम सामने आने से मामला और अधिक चर्चा में आ गया है।
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच रक्षा सहयोग को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। तीनों देशों के बीच सुरक्षा संबंधों और संभावित संयुक्त रक्षा व्यवस्था की चर्चा के बीच हूती नेता की चेतावनी को अहम माना जा रहा है। हालांकि, किसी समझौते का होना अपने आप में यह नहीं दर्शाता कि संबंधित देश यमन में सैन्य कार्रवाई करने जा रहे हैं।
पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर और देश की सैन्य ताकत को लेकर भी सोशल मीडिया पर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। लेकिन हूती नेता के बयान में पाकिस्तान की परमाणु क्षमता के इस्तेमाल या किसी परमाणु हमले का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इसलिए इस बयान को सीधे परमाणु टकराव की धमकी के रूप में पेश करना तथ्यों से आगे जाना होगा।
दूसरी ओर, तुर्की को लेकर भी हूती संगठन की चेतावनी इस बात की ओर इशारा करती है कि यमन संघर्ष में किसी नए देश की सैन्य भागीदारी क्षेत्रीय तनाव को बढ़ा सकती है। यदि कोई बाहरी देश सीधे सैन्य कार्रवाई में शामिल होता है, तो उसके परिणाम केवल यमन तक सीमित नहीं रह सकते।
फिलहाल मोहम्मद अल-बुखैती का बयान एक चेतावनी के रूप में सामने आया है। पाकिस्तान और तुर्की की ओर से इस बयान पर क्या प्रतिक्रिया आती है और क्या दोनों देश यमन के मामले में कोई सैन्य कदम उठाते हैं, इस पर नजर बनी हुई है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ कूटनीतिक दबाव बनाने की कोशिश है या आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया में कोई नया सैन्य घटनाक्रम देखने को मिलेगा?


