युद्ध यूक्रेन की जमीन पर हो रहा है, सैनिक यूक्रेन के मर रहे हैं, लेकिन अब शांति की शर्तें तय करने के लिए दुनिया की दो बड़ी ताकतों के बीच कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हैं, तो दूसरी तरफ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन। इसी बीच अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ की जेलेंस्की और पुतिन के साथ मुलाकातों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के लिए कोई बड़ी डील तैयार हो रही है? और अगर ऐसा होता है, तो क्या यूक्रेन को अपनी जमीन और सुरक्षा से समझौता करना पड़ेगा?
रूस और यूक्रेन के बीच लंबे समय से जारी युद्ध को समाप्त कराने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक प्रयास किए जा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप युद्ध खत्म कराने की दिशा में पहल करने की बात करते रहे हैं। इसी सिलसिले में उनके विशेष दूत स्टीव विटकॉफ की कूटनीतिक गतिविधियां चर्चा में हैं। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ बातचीत के बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ संपर्क को संभावित शांति प्रयासों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, इन मुलाकातों को किसी अंतिम समझौते या पुतिन और ट्रंप के बीच पक्की डील का प्रमाण मानना सही नहीं होगा।
ओस्लो में जेलेंस्की के साथ हुई बातचीत में व्यापक शांति समझौते से जुड़े तीन अहम पहलुओं पर चर्चा की जानकारी सामने आई। पहला मुद्दा यूक्रेन की दीर्घकालिक सुरक्षा की गारंटी है। यूक्रेन चाहता है कि युद्ध समाप्त होने के बाद उसे ऐसी सुरक्षा व्यवस्था मिले, जिससे भविष्य में रूस के किसी नए हमले का खतरा कम हो सके। इस सवाल पर अमेरिका और यूरोपीय देशों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन सुरक्षा की गारंटी किस रूप में दी जाएगी, कौन से देश इसमें शामिल होंगे और उसे लागू कैसे किया जाएगा, ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब किसी ठोस समझौते में ही मिल सकता है।
दूसरा बड़ा मुद्दा युद्ध के बाद यूक्रेन का आर्थिक पुनर्निर्माण है। युद्ध के कारण यूक्रेन के कई शहरों, ऊर्जा प्रतिष्ठानों, सड़कों और औद्योगिक ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है। ऐसे में देश को दोबारा खड़ा करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहायता की जरूरत होगी। पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में अमेरिका और यूरोपीय देशों की भूमिका अहम हो सकती है। इसके साथ ही रूस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों का भविष्य भी वार्ता को प्रभावित कर सकता है। यदि शांति समझौते की दिशा में प्रगति होती है, तो प्रतिबंधों में संभावित बदलाव को लेकर भी बातचीत हो सकती है, लेकिन इसे किसी तय फैसले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
तीसरा महत्वपूर्ण पहलू यूरोप की नई सुरक्षा व्यवस्था है। रूस लंबे समय से नाटो के विस्तार और अपनी सीमाओं के पास पश्चिमी सैन्य मौजूदगी को लेकर आपत्ति जताता रहा है। दूसरी तरफ यूक्रेन अपनी संप्रभुता और सुरक्षा के अधिकार से पीछे हटने को तैयार नहीं है। यूरोपीय देश भी चाहते हैं कि युद्ध समाप्त होने के बाद महाद्वीप में स्थिरता बनी रहे और भविष्य में ऐसा संघर्ष दोबारा न हो। यही वजह है कि किसी भी संभावित शांति समझौते में केवल रूस और यूक्रेन ही नहीं, बल्कि यूरोप और नाटो की भूमिका भी अहम हो सकती है।
इस कूटनीतिक प्रक्रिया में सबसे संवेदनशील सवाल यूक्रेन के कब्जे वाले क्षेत्रों का है। रूस जिन इलाकों पर नियंत्रण स्थापित कर चुका है, उन्हें लेकर उसका रुख और यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता का सवाल किसी भी समझौते को मुश्किल बना सकता है। यूक्रेन के लिए अपनी जमीन छोड़ना राजनीतिक और रणनीतिक रूप से बेहद गंभीर फैसला होगा। वहीं रूस अपनी सुरक्षा संबंधी मांगों और क्षेत्रीय दावों को वार्ता में प्रमुखता देना चाहता है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बातचीत में दोनों पक्षों के बीच किस तरह का रास्ता निकलता है।
इस पूरे घटनाक्रम में तेल कारोबार, आर्थिक प्रतिबंधों और चीन के साथ रूस के संबंधों जैसे व्यापक रणनीतिक मुद्दों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रूस की अर्थव्यवस्था पर पश्चिमी प्रतिबंधों का असर पड़ा है, जबकि चीन के साथ उसके आर्थिक और रणनीतिक संबंध महत्वपूर्ण बने हुए हैं। अमेरिका के लिए भी यूरोप की सुरक्षा, वैश्विक ऊर्जा बाजार और चीन के साथ प्रतिस्पर्धा बड़े नीतिगत मुद्दे हैं। हालांकि, इन सभी विषयों को किसी संभावित समझौते की शर्त बताने के लिए आधिकारिक पुष्टि जरूरी है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ट्रंप प्रशासन रूस और यूक्रेन के बीच ऐसा समझौता करा पाएगा, जिसे दोनों पक्ष स्वीकार कर सकें? क्या पुतिन अपनी शर्तों पर युद्ध समाप्त कराने में सफल होंगे, या जेलेंस्की यूक्रेन की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े अपने हितों को सुरक्षित रख पाएंगे? फिलहाल, बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों को अंतिम नतीजे से अलग करके देखना जरूरी है। क्योंकि युद्ध समाप्त होने की घोषणा और टिकाऊ शांति स्थापित होने के बीच बड़ा अंतर होता है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि इन बैठकों से वास्तव में कोई ठोस समझौता निकलता है या रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर कूटनीतिक खींचतान आगे भी जारी रहती है।


