उच्चतम न्यायालय ने अदालती कार्यवाही के सीधे प्रसारण यानी लाइव स्ट्रीमिंग की वीडियो क्लिप का अनधिकृत इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार को कड़े प्रावधान शामिल करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित नीतिगत ढांचे में ऐसे प्रभावी उपाय होने चाहिए, जिनसे नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जा सके। अदालत की यह सख्ती ऐसे समय सामने आई है, जब न्यायिक कार्यवाही की वीडियो क्लिप में बदलाव करने, उन्हें भ्रामक दावों के साथ प्रसारित करने और उनसे व्यावसायिक लाभ कमाने को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने शुक्रवार को इस मामले पर सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि विभिन्न उच्च न्यायालयों और अन्य संबंधित पक्षों से इस विषय पर सुझाव प्राप्त हुए हैं। इन सुझावों को व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के पास भेजा गया है।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि मंत्रालय इन सुझावों पर विचार कर रहा है और कुछ दिनों में इस संबंध में जवाब दे सकता है। उन्होंने न्यायालय से अनुरोध किया कि दीपावली की छुट्टियों के बाद मामले को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए। इस दौरान उन्होंने पूर्व में जारी प्रतिबंधों के उल्लंघन का मुद्दा भी उठाया और ऐसे वीडियो हटाने के निर्देश देने पर विचार करने का अनुरोध किया, जिन्हें प्रतिबंधों के बावजूद डिजिटल मंचों पर अपलोड किया गया है।
इस पर पीठ ने स्पष्ट किया कि निर्देशों का पालन नहीं करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए आवश्यक प्रावधान प्रस्तावित नीतिगत ढांचे का हिस्सा बनाए जाने चाहिए। न्यायालय ने अपने पहले के अंतरिम आदेशों का भी उल्लेख किया और उनके प्रभावी अनुपालन पर जोर दिया। पीठ ने कहा कि केवल दिशा-निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनका उल्लंघन होने की स्थिति में कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान भी होना चाहिए।
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालती वीडियो की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि न्यायालय की ओर से जारी किए जाने वाले प्रत्येक आधिकारिक वीडियो पर सत्यापन योग्य डिजिटल हस्ताक्षर या वॉटरमार्क होना चाहिए। इससे आम नागरिकों और डिजिटल मंचों को असली वीडियो तथा उसमें छेड़छाड़ करके तैयार किए गए वीडियो के बीच अंतर समझने में मदद मिलेगी।
उन्होंने यह सुझाव भी दिया कि उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर अदालती कार्यवाही के वीडियो प्रमाणित और वॉटरमार्क वाले प्रारूप में उपलब्ध कराए जाने चाहिए। इससे आधिकारिक वीडियो की पहचान करना आसान हो सकेगा और उनमें बदलाव करके गलत जानकारी फैलाने की आशंका कम की जा सकेगी।
दरअसल, न्यायिक कार्यवाही की छोटी-छोटी वीडियो क्लिप को सोशल मीडिया पर साझा करते समय कई बार उनके संदर्भ बदल दिए जाते हैं। कुछ मामलों में भ्रामक शीर्षक, गलत दावे या संपादित दृश्य जोड़कर उन्हें प्रसारित किया जाता है। इससे न्यायालय में कही गई बातों का वास्तविक अर्थ प्रभावित हो सकता है और आम लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
उच्चतम न्यायालय ने 24 जुलाई को जारी अपने आदेश में भी इस तरह की गतिविधियों पर रोक लगाई थी। आदेश के अनुसार, उच्चतम न्यायालय के महासचिव या संबंधित उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल की पूर्व अनुमति के बिना न्यायिक कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को सोशल मीडिया अथवा अन्य डिजिटल मंचों पर निकालने, प्रसारित करने, पोस्ट करने, दोबारा साझा करने, अपलोड करने, भेजने, उसमें बदलाव करने, संग्रहित करने, होस्ट करने या उससे कमाई करने पर प्रतिबंध लगाया गया था।
अब केंद्र सरकार को इस व्यवस्था को और प्रभावी बनाने के लिए उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई से जुड़े उपायों पर विचार करना होगा। आने वाली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि प्रस्तावित नीतिगत ढांचे में किस तरह के प्रावधान शामिल किए जाते हैं और अदालती कार्यवाही की वीडियो क्लिप के अनधिकृत इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।


