अमेरिका और ईरान के बीच वर्षों से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंधों के बीच एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक बातचीत की शुरुआत स्विट्जरलैंड में हो गई है। इस हाई-प्रोफाइल बैठक में अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान के वरिष्ठ प्रतिनिधि शामिल हुए हैं। इस वार्ता का मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर नए समझौते की संभावनाओं पर चर्चा करना और अमेरिका द्वारा फ्रीज की गई ईरान की संपत्तियों को लेकर समाधान तलाशना है।
रविवार को स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में शुरू हुई इस बैठक पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह वार्ता सफल होती है तो मध्य पूर्व क्षेत्र में लंबे समय से चल रहे तनाव को कम करने में बड़ी मदद मिल सकती है।
रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका चाहता है कि ईरान संयुक्त राष्ट्र के निरीक्षकों को अपने उन परमाणु स्थलों का निरीक्षण करने की अनुमति दे, जहां जून 2025 के बाद से कोई आधिकारिक जांच नहीं हुई है। अमेरिका का कहना है कि पारदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन इस समझौते की सबसे बड़ी शर्त होगी।
इसके बदले अमेरिका ईरान के फ्रीज किए गए फंड का एक हिस्सा जारी करने पर विचार कर रहा है। शुरुआती चरण में कतर के बैंक खातों में मौजूद लगभग 6 अरब डॉलर की राशि को मानवीय जरूरतों के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है। इस धनराशि का उपयोग खाद्य सामग्री, दवाइयों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की खरीद के लिए किया जाएगा।
जानकारी के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के बीच एक अंतरिम शांति समझौते के तहत 60 दिनों की समयसीमा तय की गई है। इसी अवधि के दौरान दोनों देशों को आगे की रणनीति और समझौते की दिशा तय करनी होगी।
इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर भी स्विट्जरलैंड पहुंच चुके हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि वह इस वार्ता को सफल बनाने और समझौते को लागू कराने में सहयोग करेगा।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने रवाना होने से पहले कहा कि उनका उद्देश्य बातचीत के लिए एक व्यावहारिक और भरोसेमंद ढांचा तैयार करना है। उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि लेबनान में जारी संघर्ष और सीजफायर को लेकर भी सकारात्मक प्रगति देखने को मिल सकती है।
ईरान की सरकारी मीडिया के अनुसार, इस बैठक में ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाक़र ग़ालिबाफ, विदेश मंत्री अब्बास अरागची और केंद्रीय बैंक के गवर्नर अब्दोलनासेर हेम्मती शामिल हैं। सभी प्रतिनिधि आर्थिक प्रतिबंधों और परमाणु मुद्दे पर ठोस समाधान तलाशने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि इस वार्ता के सामने कई चुनौतियां भी मौजूद हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि क्षेत्रीय राजनीतिक परिस्थितियों और सुरक्षा चिंताओं के चलते इजरायल इस प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच यह समझौता सफल होता है तो यह सिर्फ दोनों देशों के संबंधों को बेहतर नहीं बनाएगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, मध्य पूर्व की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी सकारात्मक असर डाल सकता है।
अब दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले 60 दिनों में यह वार्ता किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या दोनों देश वर्षों पुराने विवाद को पीछे छोड़कर नए रिश्तों की शुरुआत कर पाते हैं।


