भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को लेकर एक नया राजनीतिक विवाद सामने आया है। न्यूज़ीलैंड के विदेश मंत्री और न्यूज़ीलैंड फर्स्ट पार्टी के नेता विंस्टन पीटर्स ने आरोप लगाया है कि सत्तारूढ़ नेशनल पार्टी ने भारत से जुड़े इमिग्रेशन नियमों में कथित रूप से ऐसे बदलाव किए हैं, जिनका असर भारतीय नागरिकों पर पड़ सकता है।
विंस्टन पीटर्स का दावा है कि ये बदलाव भारत सरकार को पूरी जानकारी दिए बिना किए गए। उनका कहना है कि प्रस्तावित संशोधनों को लेकर सरकारी अधिकारियों ने पहले ही मंत्रियों को चेतावनी दी थी कि इससे भारत और न्यूज़ीलैंड के द्विपक्षीय संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
गौरतलब है कि भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच इस वर्ष अप्रैल में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए थे। हालांकि, इस समझौते का मसौदा अभी न्यूज़ीलैंड की संसद में औपचारिक मंजूरी की प्रक्रिया से गुजर रहा है। इसी दौरान इमिग्रेशन नियमों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
25 जून को संसद में बिल की पहली रीडिंग के दौरान विंस्टन पीटर्स ने आरोप लगाया कि शुरुआती बातचीत में भारत के लिए कुछ इमिग्रेशन रियायतों पर सहमति बनी थी, लेकिन बाद में सरकार ने कथित तौर पर अपना रुख बदल लिया। उन्होंने दावा किया कि यह बदलाव सार्वजनिक रूप से बताए बिना किए गए।
पीटर्स ने अपने आरोपों के समर्थन में इमिग्रेशन मंत्री को अधिकारियों द्वारा दी गई एक गोपनीय ब्रीफिंग का हवाला दिया। हालांकि, कैबिनेट गोपनीयता नियमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने उस दस्तावेज़ का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया।
उन्होंने यह भी दावा किया कि इमिग्रेशन अधिकारियों ने सरकार को चेतावनी दी थी कि यदि प्रस्तावित बदलाव लागू किए गए, तो इससे भारत के साथ न्यूज़ीलैंड के संबंध प्रभावित हो सकते हैं। साथ ही देश की अंतरराष्ट्रीय छवि, व्यापारिक प्रतिष्ठा और भविष्य के आर्थिक सहयोग पर भी असर पड़ने की आशंका जताई गई थी। अधिकारियों ने कथित तौर पर संभावित कानूनी चुनौतियों और भारत की ओर से जवाबी कदम उठाए जाने की संभावना का भी उल्लेख किया था।
विंस्टन पीटर्स का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उनकी पार्टी मौजूदा तीन-दलीय गठबंधन सरकार का हिस्सा है। उन्होंने पहले गठबंधन समझौते के तहत उप-प्रधानमंत्री के रूप में भी कार्य किया है। ऐसे में उनके आरोपों ने न्यूज़ीलैंड की घरेलू राजनीति में भी नई बहस छेड़ दी है।
फिलहाल सरकार की ओर से इन आरोपों पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं यह भी स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित इमिग्रेशन बदलावों का अंतिम स्वरूप क्या होगा और वे किन श्रेणियों के आवेदकों पर लागू होंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच व्यापार, शिक्षा, निवेश और लोगों के आपसी आवागमन का संबंध लगातार मजबूत हुआ है। ऐसे में यदि इमिग्रेशन नीतियों में कोई बड़ा बदलाव होता है, तो उसका असर दोनों देशों के आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल यह मामला न्यूज़ीलैंड की संसद में विचाराधीन है और अंतिम निर्णय आना बाकी है। आने वाले दिनों में संसद की बहस, सरकार का आधिकारिक रुख और भारत की संभावित प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करेगी। भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच सहयोग को देखते हुए दोनों देशों की नजर अब इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर बनी हुई है।


