भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने देश की न्यायिक व्यवस्था पर बढ़ते मामलों के दबाव को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहा तो साल 2026 में सुप्रीम कोर्ट में दर्ज होने वाले नए मामलों की संख्या 1 लाख से अधिक हो सकती है। इस चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने अधिक न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति, नए कोर्टरूम और न्यायिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
शनिवार को जिला अदालत परिसर में मल्टी-लेवल पार्किंग सुविधा के उद्घाटन के अवसर पर संबोधित करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि केवल न्यायिक अधिकारियों की भर्ती करना पर्याप्त नहीं है। यदि उनके लिए पर्याप्त कोर्टरूम और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं होंगी, तो नई नियुक्तियों का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा।
उन्होंने कहा कि पंजाब और हरियाणा में सब-डिविजनल स्तर पर वकीलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे न्यायिक अधिकारियों की मांग भी बढ़ती जा रही है। हालांकि, हर साल भर्ती प्रक्रिया के बावजूद सभी स्वीकृत पद नहीं भर पाते। इसका एक प्रमुख कारण न्यायिक बुनियादी ढांचे की कमी है।
CJI ने कहा कि यदि कोर्टरूम ही उपलब्ध नहीं होंगे तो नए न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति का कोई व्यावहारिक लाभ नहीं होगा। उन्होंने राज्य सरकारों से जिला और उप-मंडल स्तर की अदालतों में आधुनिक सुविधाएं विकसित करने और आवश्यक बुनियादी ढांचे का विस्तार करने की अपील की।
सुप्रीम कोर्ट में लगातार बढ़ रहे हैं नए मामले
मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट के आंकड़ों का उदाहरण देते हुए बताया कि 2024 में लगभग 75 हजार नए मामले दर्ज हुए थे। वर्ष 2025 में यह संख्या बढ़कर करीब 80 से 83 हजार तक पहुंच गई। उन्होंने कहा कि इस वर्ष नए मामलों की संख्या 1 लाख के आंकड़े को पार करने की संभावना है।
उन्होंने बताया कि इसी बढ़ते कार्यभार को देखते हुए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 कर दी है।
लंबित मामलों पर क्या बोले CJI?
CJI सूर्यकांत ने लंबित मामलों (Pending Cases) को लेकर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि आमतौर पर लंबित मामलों की संख्या को लेकर कई तरह की धारणाएं बनाई जाती हैं, लेकिन इस विषय को सही संदर्भ में समझना जरूरी है।
उनके अनुसार, जैसे ही कोई मामला अदालत में दाखिल होता है, वह पेंडिंग मामलों की सूची में शामिल हो जाता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह न्यायिक देरी (Arrears) का उदाहरण है। किसी भी मामले में नोटिस जारी करना, दोनों पक्षों को सुनना, सबूत लेना और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना न्याय का अनिवार्य हिस्सा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक किसी मामले में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पूरी की जा रही है, तब तक उसे केवल लंबित होने के आधार पर न्यायिक देरी नहीं कहा जा सकता। न्याय व्यवस्था में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता है।
CJI ने कहा कि समय पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए केवल जजों की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अदालतों का बुनियादी ढांचा, आधुनिक सुविधाएं और पर्याप्त कोर्टरूम भी उतने ही जरूरी हैं।


