भारतीय अर्थव्यवस्था में इस समय रुपये की कमजोरी और बढ़ते भुगतान संतुलन (Balance of Payments) के घाटे को लेकर चर्चा तेज है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी पूंजी आकर्षित करने और रुपये को स्थिर रखने के लिए कई नीतिगत कदम उठाए हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के कारण भारतीय मुद्रा पर दबाव अभी भी बना हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये की चाल केवल RBI के हस्तक्षेप से तय नहीं होती, बल्कि विदेशी निवेश, वैश्विक डॉलर की मजबूती और भुगतान संतुलन जैसे कई कारकों का उस पर सीधा असर पड़ता है।
RBI ने उठाए कई अहम कदम
हाल के समय में भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशी पूंजी प्रवाह बढ़ाने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की हैं। इनमें शामिल हैं—
विदेशी मुद्रा अनिवासी (FCNR) बैंक जमाओं पर विनिमय जोखिम से जुड़ी सुविधाएं।
सरकारी कंपनियों के बाहरी वाणिज्यिक ऋण (ECB) के लिए रियायती विनिमय व्यवस्था।
विदेशी निवेशकों के लिए सरकारी प्रतिभूतियों पर कर संबंधी राहत।
निर्यातकों को विदेशी मुद्रा प्राप्त करने की समय-सीमा में विस्तार।
इन उपायों का उद्देश्य विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ाना और देश के भुगतान संतुलन को मजबूत करना है।
कुछ समय मजबूत हुआ रुपया, फिर बढ़ा दबाव
इन घोषणाओं के बाद रुपये में कुछ समय के लिए मजबूती देखने को मिली और डॉलर के मुकाबले इसकी स्थिति बेहतर हुई। हालांकि यह सुधार लंबे समय तक नहीं टिक सका और बाद में रुपये पर दोबारा दबाव बढ़ गया।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इन नीतियों का मकसद रुपये को अचानक मजबूत करना नहीं, बल्कि विदेशी निवेश आकर्षित कर अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करना है।
भुगतान संतुलन का बढ़ता घाटा बना बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये पर दबाव का सबसे बड़ा कारण भुगतान संतुलन (Balance of Payments) में बढ़ता घाटा है। यदि किसी देश से विदेशी मुद्रा का बहिर्गमन, उसके मुकाबले आने वाली विदेशी मुद्रा से अधिक होता है, तो इसका असर स्थानीय मुद्रा पर पड़ता है।
इसके साथ ही पूंजी खाते में कमजोर प्रवाह ने भी विदेशी मुद्रा की उपलब्धता पर असर डाला है, जिससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है।
विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने पर RBI का फोकस
विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी निवेश आने के बावजूद RBI अतिरिक्त डॉलर खरीदकर देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने की रणनीति अपनाता है। इससे रुपये में अत्यधिक तेजी नहीं आती और निर्यात क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी बनी रहती है।
यही कारण है कि विदेशी पूंजी आने के बावजूद रुपये में सीमित सुधार देखने को मिल सकता है।
वैश्विक कारण भी बढ़ा रहे हैं दबाव
अमेरिकी डॉलर की मजबूती भी भारतीय रुपये सहित कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर असर डाल रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इन कारणों से डॉलर मजबूत बना हुआ है—
अमेरिकी केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति।
ब्याज दरों को लेकर वैश्विक बाजार की अपेक्षाएं।
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव।
सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर की बढ़ती मांग।
इन परिस्थितियों में निवेशकों का रुझान डॉलर की ओर बढ़ने से उभरते देशों की मुद्राओं पर दबाव बना रहता है।
आगे क्या रह सकती है स्थिति?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां स्थिर रहती हैं और भारत में विदेशी निवेश का प्रवाह मजबूत होता है, तो आने वाले महीनों में रुपये में धीरे-धीरे सुधार देखने को मिल सकता है। हालांकि RBI की विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने की रणनीति और वैश्विक डॉलर की मजबूती के चलते रुपये में तेज उछाल की संभावना फिलहाल सीमित मानी जा रही है।


