रूस और भारत के बीच दोस्ती की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है। मॉस्को में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर की मुलाकात हुई है, लेकिन इस मुलाकात के पीछे सिर्फ कूटनीतिक बातचीत नहीं, बल्कि रूस के एक बेहद खास और रणनीतिक इलाके का मुद्दा भी चर्चा में है। आखिर रूस का वो कौन सा इलाका है, जिसकी वजह से यूरोप से लेकर अमेरिका तक की नजरें इस क्षेत्र पर बनी हुई हैं और भारत की भूमिका यहां इतनी महत्वपूर्ण क्यों मानी जा रही है?
दरअसल, रूस का कैलिनिनग्राद ऐसा इलाका है जो रूस के मुख्य भूभाग से अलग है। यह बाल्टिक सागर के किनारे स्थित है और इसके आसपास यूरोपीय देशों की सीमाएं हैं। रूस के लिए यह इलाका सैन्य और रणनीतिक नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यही वजह है कि रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव बढ़ने के साथ कैलिनिनग्राद की चर्चा भी लगातार तेज होती रही है।
कैलिनिनग्राद की सबसे बड़ी खासियत और चुनौती दोनों उसकी भौगोलिक स्थिति है। रूस के मुख्य हिस्से से अलग होने के कारण यहां जरूरी सामान की सप्लाई के लिए समुद्री और दूसरे परिवहन मार्गों का महत्व बहुत ज्यादा हो जाता है। अगर किसी कारण से सप्लाई रूट पर दबाव बढ़ता है तो इस इलाके में रहने वाली आबादी के लिए भोजन, ईंधन और दूसरी जरूरी चीजों की आपूर्ति चुनौती बन सकती है।
इसी वजह से रूस और NATO के बीच बढ़ते तनाव के दौरान कैलिनिनग्राद को लेकर रणनीतिक चिंताएं भी सामने आती रही हैं। NATO के सदस्य देशों की मौजूदगी इस इलाके के आसपास है और बाल्टिक क्षेत्र पहले से ही रूस और पश्चिम के बीच तनाव का एक संवेदनशील केंद्र बना हुआ है। हालांकि, सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्टों में NATO या अमेरिका के जहाजों की संदिग्ध गतिविधियों को लेकर कई दावे किए जाते हैं, लेकिन हर दावे को सही मान लेना उचित नहीं है।
इसी बीच भारत और रूस के रिश्ते भी लगातार मजबूत बने हुए हैं। एस जयशंकर ने मॉस्को में राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात की और दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों तथा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर चर्चा हुई। भारत और रूस के बीच ऊर्जा, व्यापार, रक्षा और रणनीतिक सहयोग लंबे समय से दोनों देशों के रिश्तों की मजबूत नींव रहे हैं।
इस मुलाकात को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि दुनिया इस समय कई बड़े भू-राजनीतिक संकटों से गुजर रही है। रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध, रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव तथा वैश्विक ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति पर पड़ता असर पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। ऐसे समय में भारत का रूस के साथ लगातार संवाद बनाए रखना अपने आप में महत्वपूर्ण संदेश देता है।
भारत पहले भी मुश्किल परिस्थितियों में रूस के साथ आर्थिक और व्यापारिक संबंध बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। ऊर्जा और उर्वरक जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग ने वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद एक अलग स्तर बनाए रखा है। यही वजह है कि रूस के लिए भारत केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी भी है।
अब सवाल यह है कि क्या भारत वास्तव में रूस के कैलिनिनग्राद जैसे रणनीतिक इलाके को किसी संभावित संकट से बचाने में भूमिका निभा सकता है? इसका सीधा जवाब देना अभी मुश्किल है। भारत की भूमिका किसी सैन्य टकराव में सीधे शामिल होने से ज्यादा कूटनीतिक और आर्थिक स्तर पर महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत लगातार बातचीत और कूटनीति के जरिए तनाव कम करने की बात करता रहा है।
अगर आने वाले समय में रूस और पश्चिम के बीच तनाव और बढ़ता है, तो कैलिनिनग्राद जैसे इलाके और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकते हैं। ऐसे में वहां की सप्लाई, व्यापारिक रास्ते और समुद्री संपर्कों पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी। भारत और रूस के बीच मजबूत आर्थिक रिश्ते भी ऐसी परिस्थितियों में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
फिलहाल पुतिन और जयशंकर की मुलाकात ने एक बात साफ कर दी है कि बदलती वैश्विक राजनीति के बीच भारत और रूस के बीच संवाद लगातार जारी है। कैलिनिनग्राद को लेकर कई तरह के दावे सामने आ रहे हैं, लेकिन किसी भी सैन्य हमले या NATO की कथित योजना को लेकर अपुष्ट जानकारी को तथ्य मानना सही नहीं होगा।
आने वाले दिनों में अगर रूस और NATO के बीच तनाव बढ़ता है तो कैलिनिनग्राद फिर से दुनिया की सुर्खियों में आ सकता है। और तब सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि भारत रूस के इस रणनीतिक क्षेत्र को लेकर पैदा होने वाले किसी संकट में कितनी बड़ी कूटनीतिक भूमिका निभा सकता है।


