मध्य प्रदेश के खरगोन में 2022 के रामनवमी दंगा मामले से जुड़ा एक बड़ा अदालती फैसला सामने आया है। अदालत ने इस मामले में आरोपी बनाए गए सभी 11 लोगों को बरी कर दिया है। जुलाई 2026 में चतुर्थ अपर सत्र न्यायाधीश मुकेश नाथ की अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा। इस फैसले के बाद मामले में लंबे समय से चल रही कानूनी कार्रवाई पर फिलहाल विराम लग गया है।
दरअसल, खरगोन में वर्ष 2022 में रामनवमी के दौरान हिंसा भड़क गई थी। इस दौरान कई इलाकों में तनाव की स्थिति पैदा हुई और पुलिस ने मामले में अलग-अलग लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए थे। इसी कार्रवाई के तहत इन 11 आरोपियों के खिलाफ भी गंभीर आरोप लगाए गए और मामला अदालत तक पहुंचा। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने आरोपों को साबित करने के लिए गवाहों और उपलब्ध साक्ष्यों को अदालत के सामने पेश किया।
लेकिन मामले की सुनवाई आगे बढ़ने के साथ अभियोजन पक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती गवाहों के बयानों को लेकर सामने आई। अदालत में पेश किए गए कई अहम गवाह अपने पहले के बयानों से मुकर गए। यानी जांच के दौरान उन्होंने पुलिस को जो बातें बताई थीं, अदालत में उनके बयान उसी तरह कायम नहीं रहे। इससे अभियोजन पक्ष की पूरी कहानी पर सवाल खड़े हुए और आरोपों को साबित करने के लिए जरूरी कड़ी कमजोर पड़ती चली गई।
अदालत ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का परीक्षण करने के बाद पाया कि आरोपियों के खिलाफ ऐसा ठोस प्रमाण सामने नहीं आया, जिसके आधार पर उन्हें दोषी ठहराया जा सके। आपराधिक मामलों में किसी आरोपी को दोषी साबित करने के लिए आरोपों का संदेह से परे प्रमाणित होना जरूरी होता है। जब अदालत को उपलब्ध साक्ष्यों से दोष सिद्ध होने को लेकर पर्याप्त विश्वास नहीं हुआ, तो आरोपियों को संदेह का लाभ दिया गया।
इस मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से आरोपों को साबित करने के लिए पेश किए गए साक्ष्य भी अदालत की कसौटी पर पर्याप्त नहीं माने गए। गवाहों के मुकरने के साथ ठोस सबूतों की कमी ने अभियोजन के मामले को और कमजोर कर दिया। अदालत ने इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सभी 11 आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।
फैसले के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि दंगा जैसे गंभीर मामलों में जांच और गवाहों के बयान कितने महत्वपूर्ण होते हैं। किसी भी आपराधिक मुकदमे में केवल आरोप लगना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि अदालत के सामने ऐसे विश्वसनीय साक्ष्य पेश करना जरूरी होता है, जिनसे अपराध में आरोपी की भूमिका स्पष्ट रूप से साबित हो सके। खरगोन के इस मामले में यही कड़ी कमजोर साबित हुई।
वहीं, गवाहों के अपने पुराने बयानों से मुकर जाने का असर भी सीधे मुकदमे के नतीजे पर पड़ा। अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन आरोपियों के खिलाफ मामला संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। इसके बाद सभी 11 आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
खरगोन रामनवमी हिंसा का मामला उस समय पूरे प्रदेश में चर्चा में रहा था और घटना के बाद प्रशासन की ओर से भी कई कदम उठाए गए थे। अब वर्षों बाद इसी मामले से जुड़े 11 आरोपियों को अदालत से राहत मिली है। हालांकि इस फैसले के साथ एक बार फिर यह बहस सामने आ गई है कि गंभीर मामलों में मजबूत साक्ष्य जुटाना और गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करना कितना महत्वपूर्ण है।
फिलहाल अदालत के इस फैसले का सबसे अहम आधार यही रहा कि आरोपियों के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त और ठोस सबूत उपलब्ध नहीं थे। ऐसे में अदालत ने कानून के उस सिद्धांत के तहत आरोपियों को संदेह का लाभ दिया, जिसके मुताबिक जब अभियोजन पक्ष अपराध साबित करने में असफल रहता है तो आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।


