रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने उत्तर कोरिया और ईरान के साथ रूस के बढ़ते सैन्य और रणनीतिक संबंधों का खुलकर बचाव किया है। उन्होंने पश्चिमी देशों के उस नजरिए को खारिज कर दिया, जिसमें ईरान और उत्तर कोरिया को लंबे समय से ‘पैरिया स्टेट्स’ यानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग माने जाने वाले देशों के रूप में देखा जाता रहा है। लावरोव का बयान ऐसे समय में आया है जब यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने पश्चिमी देशों के दबाव और प्रतिबंधों के बीच ईरान और उत्तर कोरिया के साथ अपने रिश्तों को तेजी से मजबूत किया है। मॉस्को के इन दोनों देशों के साथ बढ़ते सैन्य और कूटनीतिक संबंध अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का बड़ा विषय बन चुके हैं।
रूसी ब्रॉडकास्टर RBC को दिए एक इंटरव्यू में सर्गेई लावरोव से रूस के बदलते कूटनीतिक समीकरणों को लेकर सवाल किया गया। उनसे पूछा गया कि आखिर रूस ऐसी स्थिति में कैसे पहुंच गया, जहां उत्तर कोरिया और ईरान उसके दो प्रमुख सहयोगियों के तौर पर नजर आते हैं। पत्रकार ने सवाल में यह भी कहा कि जिन देशों को दुनिया के बड़े हिस्से में कभी ‘पैरिया स्टेट्स’ यानी अलग-थलग देश माना जाता था, आज वही रूस के करीबी साझेदारों में शामिल हैं। सवाल मूल रूप से रूस की विदेश नीति में आए इस बड़े बदलाव को लेकर था, लेकिन लावरोव ने जवाब देते हुए सवाल के पीछे छिपी धारणा को ही चुनौती दे दी।
लावरोव ने कहा कि उत्तर कोरिया और ईरान को ‘पैरिया’ उन लोगों ने माना था, जो खुद को शीत युद्ध का विजेता समझते थे और दुनिया के इतिहास के ‘अंत’ की घोषणा कर चुके थे। इसके बाद उन्होंने बेहद संक्षिप्त लेकिन राजनीतिक तौर पर तीखा सवाल किया—ऐसी संगत में खराबी क्या है? लावरोव के इस जवाब से साफ संकेत मिलता है कि मॉस्को अब पश्चिमी देशों द्वारा तय किए गए राजनीतिक और कूटनीतिक मानकों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। रूस का तर्क है कि उसे अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर दुनिया के किसी भी देश के साथ संबंध विकसित करने का अधिकार है।
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस और पश्चिमी देशों के बीच टकराव काफी बढ़ गया। 2022 में यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू करने के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों समेत पश्चिमी देशों ने रूस पर कई दौर के आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंध लगाए। इसके बाद मॉस्को ने पश्चिमी गठबंधन से बाहर के देशों के साथ अपने संबंधों को और ज्यादा सक्रिय करना शुरू किया। इसी प्रक्रिया में ईरान और उत्तर कोरिया रूस के लिए महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में उभरे हैं।
ईरान और रूस के बीच सैन्य और रणनीतिक सहयोग लगातार चर्चा में रहा है, जबकि उत्तर कोरिया के साथ रूस के संबंधों ने भी पिछले कुछ समय में नया आयाम लिया है। दोनों देशों के बीच रक्षा और रणनीतिक सहयोग बढ़ने से पश्चिमी देशों की चिंता भी बढ़ी है। रूस हालांकि इन रिश्तों को पश्चिम के खिलाफ किसी विशेष गठबंधन के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों और आपसी सहयोग के हिस्से के तौर पर पेश करता है।
लावरोव का बयान इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। उनका संदेश यह है कि रूस अंतरराष्ट्रीय मंच पर पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद अपने सहयोगियों का चुनाव खुद करेगा। मॉस्को अब उन देशों के साथ संबंध मजबूत करने से पीछे हटता दिखाई नहीं दे रहा, जिन्हें अमेरिका और उसके सहयोगी देश लंबे समय से अलग-थलग करने की कोशिश करते रहे हैं। ऐसे में रूस, ईरान और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ती नजदीकी आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
अब सवाल यह है कि रूस की इन बढ़ती साझेदारियों का यूक्रेन युद्ध और वैश्विक कूटनीति पर कितना असर पड़ेगा। क्या ईरान और उत्तर कोरिया के साथ मजबूत होते रिश्ते रूस को पश्चिमी दबाव का सामना करने में और ताकत देंगे, या फिर इससे मॉस्को और पश्चिम के बीच तनाव और बढ़ेगा? फिलहाल लावरोव का बयान साफ संदेश दे रहा है कि रूस अपने नए कूटनीतिक समीकरणों को लेकर रक्षात्मक नहीं, बल्कि पूरी तरह आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है।


