सेंट लुईस में भारतीय शतरंज के युवा सितारे प्रज्ञानानंद ने इतिहास रच दिया है। 21 वर्षीय भारतीय खिलाड़ी ने फैबियानो करूआना को 15-13 के अंतर से हराकर ग्रैंड चेस टूर फाइनल का खिताब अपने नाम कर लिया। इस जीत के साथ प्रज्ञानानंद इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट को जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बन गए हैं।
ग्रैंड चेस टूर के 11 साल के इतिहास में इससे पहले छह खिलाड़ी यह खिताब अपने नाम कर चुके थे, लेकिन किसी भारतीय खिलाड़ी को यह सफलता नहीं मिली थी। प्रज्ञानानंद की इस ऐतिहासिक जीत के साथ भारतीय शतरंज के खाते में एक और बड़ी उपलब्धि जुड़ गई है। खिताब जीतने के साथ उन्हें दो लाख अमेरिकी डॉलर की पुरस्कार राशि भी मिली।
प्रज्ञानानंद के लिए यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि टूर्नामेंट की शुरुआत उनके लिए बिल्कुल आसान नहीं रही थी। फैबियानो करूआना के खिलाफ शुरुआती शास्त्रीय मुकाबले में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद दूसरे मुकाबले में भी उनके पास बराबरी का मौका था, लेकिन वह उसे भुना नहीं सके।
हालांकि भारतीय खिलाड़ी ने दबाव में टूटने के बजाय शानदार वापसी की। रैपिड वर्ग में प्रज्ञानानंद ने दोनों मुकाबले जीतकर पूरा समीकरण बदल दिया। इसके बाद ब्लिट्ज वर्ग में दोनों खिलाड़ियों के बीच कड़ा मुकाबला हुआ और चार बाजियों में दोनों ने 4-4 अंक हासिल किए। आखिरकार कुल स्कोर 15-13 से प्रज्ञानानंद के पक्ष में रहा और उन्होंने ट्रॉफी पर कब्जा कर लिया।
इस जीत ने प्रज्ञानानंद की हालिया फॉर्म में आए बड़े बदलाव को भी दिखाया है। कुछ समय पहले 2026 कैंडिडेट्स प्रतियोगिता में उनका प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा था। उस दौर में उनकी लय को लेकर सवाल भी उठे थे। पांच बार के विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद ने भी माना था कि पिछले साल के अंत से प्रज्ञानानंद अपनी सर्वश्रेष्ठ लय में नहीं थे।
लेकिन इसके बाद भारतीय खिलाड़ी ने जिस अंदाज में वापसी की, उसने पूरी तस्वीर बदल दी। नॉर्वे शतरंज प्रतियोगिता में भी वह शुरुआत में पीछे चल रहे थे, लेकिन लगातार चार जीत दर्ज करके उन्होंने शानदार वापसी की। इसके बाद ग्रैंड चेस टूर में उनका प्रदर्शन लगातार बेहतर होता गया।
सेंट लुईस पहुंचने से पहले ही प्रज्ञानानंद रैपिड वर्ग में अपनी क्षमता दिखा चुके थे। ब्लिट्ज में भी उन्होंने महत्वपूर्ण अंक जुटाए और फाइनल में करूआना के खिलाफ शुरुआती झटके के बाद खुद को संभालते हुए खिताब तक पहुंच गए।
प्रज्ञानानंद की इस सफलता को विश्वनाथन आनंद ने भी बेहद खास माना है। आनंद के मुताबिक मौजूदा प्रदर्शन को देखते हुए प्रज्ञानानंद को दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी माना जा सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि मैग्नस कार्लसन सभी समान प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं लेते हैं, इसलिए इस तुलना को सीधे तौर पर नहीं देखा जा सकता।
भारतीय खिलाड़ी की वापसी सिर्फ एक टूर्नामेंट तक सीमित नहीं रही। सिंकफील्ड कप में उन्होंने जावोखिर सिंदारोव के साथ संयुक्त रूप से पहला स्थान हासिल किया। सिंदारोव वही खिलाड़ी हैं, जिन्होंने साइप्रस कैंडिडेट्स में प्रज्ञानानंद को दो बार हराया था। वहीं ग्रैंड चेस टूर के सेमीफाइनल में विन्सेंट कीमर को हराकर उन्होंने पिछली हार का भी जवाब दिया।
प्रज्ञानानंद की सबसे बड़ी ताकत अब दबाव के बीच मुकाबले का रुख बदलने की क्षमता बनती जा रही है। फाइनल में भी उन्होंने शुरुआती हार के बाद धैर्य बनाए रखा और रैपिड में लगातार दो जीत हासिल करके मुकाबला अपने पक्ष में कर लिया।
अब उनकी इस ऐतिहासिक जीत से भारतीय शतरंज प्रेमियों की उम्मीदें और बढ़ गई हैं। अगले महीने होने वाले शतरंज ओलंपियाड से पहले प्रज्ञानानंद का शानदार प्रदर्शन भारतीय टीम के लिए भी बड़ा आत्मविश्वास लेकर आया है।
कैंडिडेट्स की निराशा से लेकर ग्रैंड चेस टूर फाइनल के ऐतिहासिक खिताब तक प्रज्ञानानंद का सफर उनकी शानदार वापसी की कहानी है। 21 साल की उम्र में पहला भारतीय Grand Chess Tour विजेता बनकर उन्होंने विश्व शतरंज में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है।


