एशियाई खेलों से पहले भारतीय एथलेटिक्स टीम अपनी तैयारियों को और धार देने में जुट गई है। इसी कड़ी में स्टीपलचेज धावक अविनाश साबले और लंबी दूरी की धाविका पारुल चौधरी समेत आठ भारतीय ट्रैक एवं फील्ड एथलीट बेंगलुरु स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण यानी SAI के राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र में विशेष ‘स्मार्ट ट्रैक’ पर अभ्यास कर रहे हैं। यह विशेष प्रशिक्षण शिविर 8 सितंबर तक चलेगा और इसे टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम यानी TOPS के तहत मंजूरी दी गई है।
इस शिविर का मकसद खिलाड़ियों को सिर्फ सामान्य अभ्यास कराना नहीं, बल्कि तकनीक की मदद से उनकी तैयारियों का बेहद बारीकी से विश्लेषण करना है। स्मार्ट ट्रैक की खासियत यह है कि इस पर अभ्यास करते समय एथलीट के प्रदर्शन से जुड़े कई महत्वपूर्ण आंकड़े रियल टाइम में उपलब्ध हो जाते हैं। इनमें दौड़ने की गति, अलग-अलग हिस्सों की स्प्लिट टाइमिंग और स्ट्राइड की लंबाई जैसे आंकड़े शामिल हैं। यानी कोच को यह जानकारी तुरंत मिल सकती है कि खिलाड़ी ने दौड़ के किस हिस्से में कैसा प्रदर्शन किया।
शिविर में अविनाश साबले और पारुल चौधरी के अलावा 800 मीटर धावक कृष्ण कुमार, डेकाथलॉन एथलीट तौफीक एन, ऊंची कूद के एथलीट आदर्श राम और सुप्रिया बी तथा पैदल चाल खिलाड़ी मंजू रानी और प्रियंका भी शामिल हैं। सभी खिलाड़ी एशियाई खेलों को ध्यान में रखते हुए अपनी फिटनेस, तकनीक और प्रदर्शन को बेहतर करने पर काम कर रहे हैं।
एशियाई खेलों का आयोजन जापान के आइची-नागोया में 19 सितंबर से 4 अक्टूबर तक होना है। ऐसे में प्रतियोगिता से ठीक पहले खिलाड़ियों को उच्च स्तरीय प्रशिक्षण देने के लिए इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासतौर पर ट्रैक इवेंट में मामूली अंतर भी प्रदर्शन और पदक के बीच बड़ा फर्क पैदा कर सकता है। ऐसे में रियल टाइम आंकड़े खिलाड़ियों और कोचों को अपनी रणनीति सुधारने में मदद कर सकते हैं।
SAI राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र बेंगलुरु के एथलेटिक्स कोच सुरेश कुमार ने स्मार्ट ट्रैक को भारत में अपनी तरह का पहला ट्रैक बताया है। उनके मुताबिक जब एथलीट दौड़ता है, उसी समय उसकी गति से जुड़े आंकड़े प्राप्त किए जा सकते हैं। ट्रैक पर अलग-अलग स्थानों पर लगाए गए टाइमिंग गेट के जरिए स्प्लिट टाइमिंग रिकॉर्ड होती है। इसके साथ ही कुल समय और एथलीट की स्ट्राइड की लंबाई की जानकारी भी हासिल की जा सकती है।
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि कोच को केवल दौड़ खत्म होने के बाद के परिणाम पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। वह दौड़ के दौरान ही यह देख सकता है कि खिलाड़ी किस चरण में तेज है और कहां उसकी गति कम हो रही है। इसके आधार पर प्रशिक्षण में बदलाव किए जा सकते हैं। एथलीट की तकनीक में छोटी-छोटी कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करने में भी यह डेटा मददगार साबित हो सकता है।
स्मार्ट ट्रैक को साल 2024 में स्थापित किया गया था और तब से इसका इस्तेमाल राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र में प्रशिक्षण लेने वाले शीर्ष स्तर के एथलीट करते आ रहे हैं। ट्रैक की एक खास बात यह भी है कि इसके टाइमिंग गेट केवल सीधे हिस्से में ही नहीं, बल्कि घुमावदार हिस्से में भी लगाए गए हैं। इससे कोच दौड़ के अलग-अलग चरणों का अधिक विस्तार से विश्लेषण कर सकते हैं।
इस सिस्टम के साथ उपलब्ध ऐप के जरिए रिकॉर्ड किए गए आंकड़ों को तुरंत हासिल किया जा सकता है और बाद में उनका विश्लेषण भी किया जा सकता है। यानी खिलाड़ियों के प्रदर्शन का डेटा केवल प्रशिक्षण के दौरान देखने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसे आगे की तैयारी और रणनीति बनाने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
अविनाश साबले और पारुल चौधरी जैसे अनुभवी एथलीटों के लिए यह तकनीक खास तौर पर उपयोगी हो सकती है, क्योंकि एशियाई खेलों जैसे बड़े मंच पर प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए हर सेकेंड और हर कदम मायने रखता है। वहीं अन्य एथलीट भी इस डेटा आधारित प्रशिक्षण के जरिए अपनी तकनीक और रफ्तार को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं।
फिलहाल आठों एथलीट बेंगलुरु में 8 सितंबर तक इस विशेष शिविर का हिस्सा रहेंगे। इसके बाद उनकी नजरें जापान के आइची-नागोया में होने वाले एशियाई खेलों पर होंगी। भारतीय एथलेटिक्स के लिए यह तकनीक आधारित तैयारी कितनी कारगर साबित होती है, इसका जवाब प्रतियोगिता के दौरान मिलेगा। लेकिन इतना जरूर है कि भारत के शीर्ष एथलीट अब पारंपरिक अभ्यास के साथ आधुनिक तकनीक को भी अपनी तैयारी का अहम हिस्सा बना रहे हैं।


