31 अगस्त से 3 सितंबर 2026 तक पलाऊ में आयोजित पैसिफिक आइलैंड्स फोरम लीडर्स मीटिंग के 55वें आयोजन में चीन ने अपना दबदबा कायम करने की कोशिश की, लेकिन पैसिफिक देशों के सामने उसकी रणनीति ज्यादा असर नहीं दिखा सकी। इस सम्मेलन में ताइवान की मौजूदगी को लेकर चीन ने कड़ी आपत्ति जताई और मेजबान पलाऊ पर दबाव बनाने की कोशिश की। ताइवान पैसिफिक आइलैंड्स फोरम का डेवलपमेंट पार्टनर है और इसी हैसियत से इस सालाना बैठक में ताइवान के विदेश मंत्री लिन चिया-लुंग भी शामिल हुए। चीन के लिए ताइवान की यह मौजूदगी बेहद संवेदनशील मुद्दा है, क्योंकि बीजिंग ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी अलग पहचान और भागीदारी का लगातार विरोध करता है।
सम्मेलन के उद्घाटन समारोह से पहले ही चीन की नाराजगी खुलकर सामने आ गई थी। चीन के पैसिफिक मामलों के दूत कियान बो ने मीडिया से बातचीत में ताइवान की मौजूदगी पर कड़ी आपत्ति जताई और संकेत दिया कि पलाऊ को इसके नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं। उनके इस बयान को पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामक कूटनीति के तौर पर देखा गया। चीन लंबे समय से प्रशांत महासागर के छोटे-छोटे द्वीपीय देशों के साथ अपने राजनीतिक और आर्थिक संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में पलाऊ द्वारा ताइवान को फोरम में आमंत्रित करना बीजिंग के लिए एक बड़ा कूटनीतिक झटका माना गया।
मामला यहीं तक सीमित नहीं रहा। सम्मेलन से कुछ दिन पहले चीन के संस्कृति और पर्यटन मंत्रालय की ओर से चीनी यात्रियों को पलाऊ की यात्रा को लेकर सावधानी बरतने की सलाह जारी की गई। इसमें कथित तौर पर लूटपाट जैसे सुरक्षा जोखिमों का हवाला दिया गया। पलाऊ की अर्थव्यवस्था में पर्यटन की बड़ी भूमिका है और पर्यटक वहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं। इसलिए इस तरह की यात्रा चेतावनी को बीजिंग के दबाव की रणनीति के तौर पर देखा गया। हालांकि चीन ने इसे सुरक्षा संबंधी चिंता के रूप में पेश किया, लेकिन घटनाक्रम और समय को देखते हुए इसे पलाऊ पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश माना गया।
कियान बो ने यह भी संकेत दिया था कि चीन फोरम के दौरान डायलॉग पार्टनर्स के सामने अपनी कड़ी आपत्तियां रखेगा। माना जा रहा था कि चीन ताइवान की भागीदारी को लेकर सम्मेलन में बड़ा कूटनीतिक मुद्दा खड़ा कर सकता है। लेकिन सम्मेलन के दौरान तस्वीर कुछ अलग दिखाई दी। चीन के प्रतिनिधि ने अपने छोटे से बयान में ताइवान का उल्लेख तक नहीं किया। यानी जिस मुद्दे को लेकर बीजिंग ने पहले इतनी आक्रामक भाषा इस्तेमाल की थी, उसे फोरम के मंच पर उतनी मजबूती से आगे नहीं बढ़ाया गया।
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह पैसिफिक देशों की प्रतिक्रिया मानी जा रही है। क्षेत्र के कई नेताओं ने चीन की धमकी भरी भाषा को पसंद नहीं किया और यह संदेश दिया कि प्रशांत द्वीपीय देशों को अपने हितों और साझेदारियों को लेकर स्वतंत्र फैसला लेने का अधिकार है। यही वजह रही कि चीन की ओर से बनाया गया दबाव उस स्तर तक नहीं पहुंच सका, जिसकी बीजिंग को उम्मीद रही होगी।
पूरे घटनाक्रम को चीन और ताइवान के बीच चल रही व्यापक कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। पैसिफिक क्षेत्र में ताइवान के कुछ महत्वपूर्ण राजनयिक सहयोगी हैं और चीन लगातार इन देशों के साथ अपने संबंध बढ़ाकर ताइवान के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश करता रहा है। दूसरी ओर, ताइवान भी विकास सहयोग, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में पैसिफिक द्वीपीय देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
पलाऊ का रुख इस पूरे मामले में खास तौर पर महत्वपूर्ण है। चीन के दबाव के बावजूद ताइवान को फोरम में शामिल करना यह दिखाता है कि छोटे प्रशांत देश अपनी विदेश नीति में अपने हितों को प्राथमिकता देने की कोशिश कर रहे हैं। चीन भले ही आर्थिक और राजनीतिक ताकत के दम पर पैसिफिक क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता हो, लेकिन हर देश उसकी शर्तों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम से एक बड़ा संदेश यह भी निकलता है कि ब्लू पैसिफिक क्षेत्र में प्रभाव की लड़ाई अब केवल आर्थिक मदद या निवेश तक सीमित नहीं रही है। इसके केंद्र में कूटनीति, सुरक्षा, रणनीतिक साझेदारी और ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दे भी शामिल हो चुके हैं। चीन की कोशिश भले ही प्रशांत क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की हो, लेकिन पलाऊ में हुए घटनाक्रम ने दिखा दिया कि पैसिफिक देशों पर दबाव बनाना उतना आसान नहीं है। PIF Summit में चीन ने दादागिरी दिखाने की कोशिश जरूर की, लेकिन सदस्य देशों की प्रतिक्रिया ने यह साफ कर दिया कि ब्लू पैसिफिक को अपनी पसंद के मुताबिक ‘रेड’ करने की बीजिंग की कोशिश को हर जगह आसानी से स्वीकार नहीं किया जाएगा।


