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अमेरिका-हूती सीक्रेट डील का दावा! क्या ट्रंप ने सऊदी अरब को अकेला छोड़ दिया?

क्या अमेरिका ने हूती विद्रोहियों के साथ पर्दे के पीछे कोई समझौता कर लिया है? क्या डोनाल्ड ट्रंप की सरकार अब सऊदी अरब की सुरक्षा से ज्यादा अपने जहाजों को बचाने पर ध्यान दे रही है? ओमान में हुई कथित गुप्त बैठक को लेकर ऐसे ही कई सवाल उठ रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि अमेरिका और हूतियों के बीच बातचीत के बाद सऊदी अरब की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। लेकिन इस पूरे मामले की असल कहानी क्या है?

बताया जा रहा है कि ओमान की राजधानी मस्कट में अमेरिकी अधिकारियों और हूती प्रतिनिधियों के बीच गोपनीय बातचीत हुई। इस बैठक को लेकर सामने आए दावों के मुताबिक, बातचीत का एक अहम मुद्दा लाल सागर में जहाजों की सुरक्षा और हूतियों के हमलों को रोकना था। हालांकि, इस कथित समझौते की पूरी शर्तें सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हैं। इसलिए इसे अमेरिका और हूतियों के बीच व्यापक गठबंधन कहना जल्दबाजी होगी।

इस घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा सऊदी अरब की भूमिका को लेकर हो रही है। सऊदी अरब लंबे समय से यमन के संघर्ष से प्रभावित रहा है और हूती विद्रोहियों के साथ उसका टकराव क्षेत्रीय सुरक्षा का बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में यदि अमेरिका हूतियों के साथ बातचीत के जरिए अपने जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश करता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस प्रक्रिया में सऊदी अरब की सुरक्षा को कितनी प्राथमिकता दी जा रही है।

कथित बातचीत को लेकर यह भी दावा किया जा रहा है कि हूतियों ने अमेरिकी जहाजों पर हमले नहीं करने का आश्वासन दिया है। अगर ऐसा समझौता हुआ है, तो इसका सीधा संबंध लाल सागर में समुद्री यातायात की सुरक्षा से हो सकता है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। किसी विशेष क्षेत्र में हमले रोकने की प्रतिबद्धता का मतलब यह नहीं होता कि सभी पक्षों के बीच संघर्ष पूरी तरह समाप्त हो गया है।

दूसरी ओर, सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच तनाव की खबरें लगातार चिंता बढ़ा रही हैं। मक्का की दिशा में ड्रोन आने और उसे मार गिराने के सऊदी दावे ने भी सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े किए हैं। हूतियों ने मक्का को निशाना बनाने से इनकार किया है। ऐसे संवेदनशील मामले में दोनों पक्षों के बयानों को अलग-अलग समझना और स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार करना जरूरी है।

इसी बीच हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब के F-15 लड़ाकू विमान को गिराने का दावा भी सामने आया है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। जब तक विमान के गिरने और घटना से जुड़ी विश्वसनीय जानकारी सामने नहीं आती, तब तक इसे पुष्ट सैन्य घटना के रूप में पेश नहीं किया जा सकता।

अब सवाल यह है कि अमेरिका की इस कथित बातचीत से सऊदी अरब की रणनीति पर क्या असर पड़ सकता है? क्या रियाद अपनी सुरक्षा के लिए दूसरे क्षेत्रीय सहयोगियों पर ज्यादा निर्भर होगा? या अमेरिका और सऊदी अरब के बीच सुरक्षा सहयोग पहले की तरह जारी रहेगा? फिलहाल, इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने नहीं है।

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि बातचीत करना और किसी सहयोगी को पूरी तरह छोड़ देना दो अलग-अलग बातें हैं। अमेरिका की ओर से हूतियों के साथ कथित संपर्क को लेकर सामने आई जानकारी अपने आप यह साबित नहीं करती कि वाशिंगटन ने सऊदी अरब से सारे सुरक्षा संबंध खत्म कर दिए हैं।

फिलहाल, इस पूरे घटनाक्रम में तीन बातें अहम हैं—ओमान में अमेरिका और हूतियों के बीच कथित बातचीत, अमेरिकी जहाजों की सुरक्षा को लेकर किए जा रहे दावे और सऊदी अरब की सुरक्षा पर संभावित असर। आने वाले समय में आधिकारिक बयान और स्वतंत्र रूप से सत्यापित जानकारी ही इस मामले की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट कर पाएगी।

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