अबू धाबी में इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान की मुलाक़ात ने मध्य पूर्व की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब गाज़ा संघर्ष, ईरान से जुड़े तनाव और हूती हमलों के कारण पूरे क्षेत्र में सुरक्षा की स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। ऐसे में दोनों नेताओं की आमने-सामने हुई बातचीत को सिर्फ़ एक सामान्य कूटनीतिक मुलाक़ात के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे इज़राइल और यूएई के बीच बढ़ते रणनीतिक संबंधों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
इज़राइल और यूएई के रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव आया है। अब दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संपर्क के साथ-साथ व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग भी बढ़ा है। नेतन्याहू का अबू धाबी दौरा इसी व्यापक रिश्ते की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है। बैठक में क्षेत्रीय सुरक्षा और दोनों देशों के सामने मौजूद चुनौतियों पर चर्चा हुई। खास तौर पर ईरान और उसके सहयोगी समूहों से जुड़े सुरक्षा मुद्दे तथा हूती हमलों का खतरा क्षेत्रीय समीकरणों में महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है।
लेकिन इस पूरी कहानी में एक और बड़ा सवाल सामने आता है—सऊदी अरब की प्रतिक्रिया क्या होगी? सऊदी अरब और इज़राइल के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध अभी स्थापित नहीं हुए हैं, जबकि यूएई पहले ही इज़राइल के साथ संबंध सामान्य कर चुका है। ऐसे में अबू धाबी में इज़राइली नेतृत्व की सक्रियता खाड़ी क्षेत्र की कूटनीति पर भी ध्यान खींचती है। हालांकि किसी भी बैठक या घटनाक्रम को सऊदी अरब के लिए सीधे तौर पर किसी एक निश्चित संदेश के रूप में देखना जल्दबाज़ी होगी। फिर भी क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में यूएई की भूमिका और इज़राइल के साथ उसके संबंध सऊदी अरब सहित दूसरे खाड़ी देशों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
अब बात भारत की करें तो नई दिल्ली की नजर इस पूरे घटनाक्रम पर रहने की एक बड़ी वजह भारत के मध्य पूर्व के साथ गहरे आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। खाड़ी क्षेत्र भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, निवेश और बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों के रोजगार के लिहाज़ से महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया में अगर सुरक्षा परिस्थितियां बिगड़ती हैं, तो उसका असर ऊर्जा कीमतों, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन पर पड़ सकता है। खासकर लाल सागर और आसपास के समुद्री मार्गों में सुरक्षा चुनौती बढ़ने पर एशिया और यूरोप के बीच व्यापारिक आवाजाही प्रभावित हो सकती है।
भारत के लिए इज़राइल और यूएई दोनों ही महत्वपूर्ण साझेदार हैं। इज़राइल के साथ भारत के रक्षा, तकनीक और कृषि सहित कई क्षेत्रों में संबंध हैं, जबकि यूएई भारत के प्रमुख आर्थिक और रणनीतिक साझेदारों में शामिल है। इसके अलावा भारत और यूएई के बीच व्यापारिक रिश्ते तथा व्यापक क्षेत्रीय कनेक्टिविटी परियोजनाएं भी पश्चिम एशिया में स्थिरता को भारत के लिए महत्वपूर्ण बनाती हैं। इसलिए अबू धाबी में होने वाली ऐसी उच्चस्तरीय बातचीत को भारत क्षेत्रीय स्थिरता और अपने आर्थिक हितों के नजरिए से देखता है।
इस मुलाक़ात का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि मध्य पूर्व की राजनीति अब केवल दो देशों के रिश्तों तक सीमित नहीं रह गई है। ईरान, इज़राइल, खाड़ी देश, अमेरिका और दूसरे क्षेत्रीय पक्षों के बीच संबंध एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। किसी एक देश की सुरक्षा नीति में बदलाव का असर दूसरे देशों की रणनीति पर पड़ सकता है। इसी वजह से नेतन्याहू और यूएई नेतृत्व की बातचीत को व्यापक क्षेत्रीय समीकरणों के संदर्भ में समझना जरूरी है।
हालांकि इस बैठक से जुड़े हर मुद्दे या बंद कमरे में हुई हर चर्चा की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं है। इसलिए यह दावा करना उचित नहीं होगा कि दोनों नेताओं ने कोई बड़ा नया सैन्य या सुरक्षा समझौता निश्चित रूप से कर लिया है, जब तक उसकी आधिकारिक पुष्टि सामने न आए। फिलहाल उपलब्ध जानकारी से इतना स्पष्ट है कि क्षेत्रीय सुरक्षा, द्विपक्षीय संबंध और ईरान तथा हूती से जुड़े खतरे बातचीत के महत्वपूर्ण संदर्भ रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इज़राइल और यूएई की बढ़ती रणनीतिक नजदीकी मध्य पूर्व में नए कूटनीतिक समीकरणों को जन्म देगी? क्या इसका असर सऊदी अरब की क्षेत्रीय रणनीति पर पड़ेगा? और सबसे अहम, बदलते पश्चिम एशियाई समीकरणों में भारत अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को किस तरह संतुलित करेगा? आने वाले समय में इन सवालों के जवाब इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करने में अहम हो सकते हैं।


