भारत के स्वदेशी जेट इंजन कार्यक्रम से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है। करीब चार दशक से भारत जिस स्वदेशी लड़ाकू विमान इंजन को विकसित करने की कोशिश कर रहा है, उसी कावेरी इंजन ने रूस में किए गए महत्वपूर्ण परीक्षणों में सफलता हासिल की है। इस उपलब्धि के बाद भारत के स्वदेशी जेट इंजन कार्यक्रम को नई उम्मीद मिली है।
कावेरी इंजन को भारत में स्वदेशी लड़ाकू विमान इंजन विकसित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया था। इसका विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO की गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट, GTRE से जुड़ा रहा है। शुरुआती दौर में इस इंजन को तेजस जैसे हल्के लड़ाकू विमान के लिए इस्तेमाल करने की योजना थी, लेकिन इंजन के प्रदर्शन और तकनीकी चुनौतियों के कारण इसे लड़ाकू विमान में इस्तेमाल करने की योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
अब रूस में हुए परीक्षणों ने इस परियोजना को फिर चर्चा में ला दिया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, कावेरी के ड्राई इंजन ने कठिन हाई-एल्टीट्यूड और फ्लाइट ट्रायल्स में करीब 48.5 किलो न्यूटन का थ्रस्ट हासिल किया। बताया गया है कि परीक्षण का लक्ष्य लगभग 46 किलो न्यूटन थ्रस्ट हासिल करना था। यानी परीक्षण के दौरान इंजन ने निर्धारित लक्ष्य से अधिक थ्रस्ट पैदा किया।
यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जेट इंजन को अलग-अलग ऊंचाई और परिस्थितियों में स्थिर प्रदर्शन देना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। इंजन के परीक्षणों में सिर्फ अधिकतम थ्रस्ट ही नहीं, बल्कि उसकी स्थिरता, विश्वसनीयता और अलग-अलग परिस्थितियों में काम करने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होती है।
हालांकि इस उपलब्धि का मतलब यह नहीं है कि कावेरी इंजन तुरंत किसी लड़ाकू विमान में लगाया जा सकता है। एक आधुनिक फाइटर जेट इंजन को विमान में इस्तेमाल करने से पहले कई स्तरों के परीक्षण, प्रमाणन और एकीकरण की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। खासतौर पर आफ्टरबर्नर के साथ आवश्यक थ्रस्ट हासिल करना एक अलग तकनीकी चुनौती होगी।
कावेरी इंजन के भविष्य को लेकर अब ड्रोन क्षेत्र पर भी ध्यान दिया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसके मौजूदा स्वरूप को पहले बड़े और भारी ड्रोन जैसे प्लेटफॉर्म के लिए इस्तेमाल करने की संभावनाओं पर काम किया जा सकता है। भविष्य में इसमें आफ्टरबर्नर जैसी तकनीक जोड़कर अधिक थ्रस्ट हासिल करने की दिशा में भी विकास किया जा सकता है।
अगर कावेरी इंजन को आगे चलकर ज्यादा थ्रस्ट और बेहतर विश्वसनीयता के साथ विकसित किया जाता है, तो इससे भारत को सैन्य विमानन क्षेत्र में विदेशी इंजनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। स्वदेशी इंजन का विकास किसी भी देश के लिए बेहद जटिल तकनीकी क्षेत्र माना जाता है, क्योंकि इसमें मटेरियल साइंस, टर्बाइन तकनीक, कंप्रेसर डिजाइन, कूलिंग सिस्टम और हाई-टेम्परेचर तकनीक जैसी कई क्षमताओं की जरूरत होती है।
भारत पिछले कई वर्षों से स्वदेशी एयरो-इंजन तकनीक विकसित करने की कोशिश कर रहा है। कावेरी कार्यक्रम में सामने आई तकनीकी चुनौतियों के बावजूद इससे विकसित तकनीकों और विशेषज्ञता को आगे के इंजन कार्यक्रमों में इस्तेमाल किए जाने की संभावना बनी हुई है।
रूस में हुआ यह परीक्षण इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे कावेरी इंजन के प्रदर्शन को अलग परिस्थितियों में जांचने का अवसर मिला। 48.5 किलो न्यूटन थ्रस्ट का आंकड़ा परियोजना के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी पड़ाव है, लेकिन आगे का रास्ता अभी लंबा है।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि कावेरी इंजन के अगले चरण में क्या बदलाव किए जाते हैं, इसे किस प्लेटफॉर्म पर लगाया जाता है और भविष्य में आफ्टरबर्नर के साथ इसकी क्षमता कितनी बढ़ाई जा सकती है। फिलहाल रूस में हुए परीक्षण ने भारत के स्वदेशी जेट इंजन कार्यक्रम को एक नई तकनीकी दिशा और उम्मीद जरूर दी है।


