आज के दौर में बैंकिंग की दुनिया तेजी से बदल रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI और डिजिटल तकनीक ने बैंकिंग सेवाओं को पहले से ज्यादा तेज और आसान बना दिया है। अब कर्ज देने से लेकर ग्राहकों की पहचान और पैसों के लेनदेन तक कई काम तकनीक की मदद से किए जा रहे हैं। लेकिन क्या बैंकिंग में बढ़ती यह रफ्तार ग्राहकों की सुरक्षा पर भारी पड़ सकती है? इसी सवाल को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर स्वामीनाथन जे ने बैंकों को सतर्क रहने की सलाह दी है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि तकनीक के इस्तेमाल से कामकाज तेज जरूर होना चाहिए, लेकिन इस प्रक्रिया में सुरक्षा, आंतरिक जांच और ग्राहकों के भरोसे से समझौता नहीं किया जा सकता।
15 अक्टूबर को मुंबई में आयोजित एफई मॉडर्न बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं और बीमा शिखर सम्मेलन 2026 में बोलते हुए स्वामीनाथन जे ने बैंकिंग क्षेत्र में तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल और उससे जुड़े जोखिमों पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक बैंकों का खर्च कम करने, ग्राहकों को बेहतर सेवाएं देने और अधिक लोगों तक वित्तीय सुविधाएं पहुंचाने में मदद कर सकती है। लेकिन तकनीक के इन फायदों के साथ जोखिमों को रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था को भी मजबूत बनाना जरूरी है।
डिप्टी गवर्नर ने इस बात पर जोर दिया कि बैंक जब किसी प्रक्रिया को पूरी तरह स्वचालित करते हैं, तो उन्हें यह भी समझना चाहिए कि पुरानी व्यवस्था में मौजूद जांच के चरण किस उद्देश्य से बनाए गए थे। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी कर्मचारी द्वारा की जाने वाली जांच को कंप्यूटर प्रणाली से बदल दिया जाता है या कर्ज देने का फैसला कुछ ही समय में होने लगता है, तो इससे जोखिम अपने आप खत्म नहीं हो जाता। ऐसे में बैंक को यह सुनिश्चित करना होगा कि नई तकनीक के साथ सुरक्षा के पर्याप्त उपाय भी मौजूद हों।
स्वामीनाथन जे के मुताबिक, स्वतंत्र जांच, दो कर्मचारियों द्वारा किसी महत्वपूर्ण काम की पुष्टि और लेनदेन के बीच उचित समय का अंतर जैसी व्यवस्थाएं बैंकिंग प्रक्रिया को थोड़ा धीमा कर सकती हैं। लेकिन इनका उद्देश्य गलतियों, धोखाधड़ी और गलत लोगों को कर्ज दिए जाने की आशंका को कम करना है। इसलिए केवल काम में तेजी लाने के लिए इन सुरक्षा उपायों को हटाना बैंकों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।
बैंकिंग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल के बीच यह मुद्दा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। AI की मदद से ग्राहकों की जानकारी का विश्लेषण करने, जोखिम का आकलन करने और कई प्रक्रियाओं को स्वचालित बनाने में सहायता मिल सकती है। लेकिन इन प्रणालियों से लिए गए फैसलों की निगरानी और उनकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करना भी जरूरी है। बैंकों को यह देखना होगा कि तकनीक से होने वाली संभावित गलतियों का पता समय रहते लगाया जा सके और जरूरत पड़ने पर मानवीय जांच की व्यवस्था भी उपलब्ध हो।
स्वामीनाथन ने बाहरी कंपनियों पर निर्भरता को लेकर भी बैंकों की जिम्मेदारी स्पष्ट की। आज कई बैंक वित्तीय तकनीक कंपनियों और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म की मदद से ग्राहकों तक पहुंचते हैं। कुछ मामलों में इन्हीं कंपनियों के माध्यम से कर्ज के लिए आवेदन जुटाए जाते हैं या वित्तीय उत्पादों की बिक्री की जाती है। लेकिन किसी तीसरी कंपनी की सेवाएं लेने का मतलब यह नहीं है कि बैंक अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है। ग्राहक के साथ निष्पक्ष व्यवहार, नियमों का पालन और जोखिम प्रबंधन की जिम्मेदारी संबंधित बैंक की ही बनी रहती है।
ग्राहकों के व्यक्तिगत आंकड़ों की सुरक्षा भी इस चर्चा का एक अहम हिस्सा रही। डिजिटल बैंकिंग में बैंक बड़ी मात्रा में ग्राहकों की जानकारी जुटाते और उसका इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में केवल ग्राहक की सहमति ले लेना पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि आंकड़ों का उपयोग उचित उद्देश्य के लिए और ग्राहक की अपेक्षाओं के अनुरूप किया जाए। ग्राहकों की निजी जानकारी का गलत इस्तेमाल उनके भरोसे को कमजोर कर सकता है और वित्तीय संस्थानों के लिए गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है।
डिप्टी गवर्नर ने ग्राहकों के भरोसे को बनाए रखने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने संकेत दिया कि यदि वित्तीय उत्पाद बेचने का दबाव ग्राहकों की वास्तविक जरूरतों को समझने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, तो इससे लंबे समय में नुकसान हो सकता है। शुरुआत में कारोबार बढ़ता हुआ दिखाई दे सकता है, लेकिन गलत उत्पाद बेचे जाने या ग्राहकों के साथ अनुचित व्यवहार की स्थिति में शिकायतें, कानूनी विवाद, नियामकीय कार्रवाई और संस्थान की छवि को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।
उन्होंने कहा कि बैंकों को ग्राहकों की शिकायतों को केवल दर्ज करके निपटाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। शिकायतों का विश्लेषण करके यह पता लगाया जा सकता है कि किसी उत्पाद में क्या कमी है, कर्मचारियों को किस तरह के प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं और डिजिटल सेवाओं में कौन-सी समस्याएं बार-बार सामने आ रही हैं। यदि इन शिकायतों से मिलने वाले संकेतों पर समय रहते कार्रवाई की जाए, तो भविष्य में बड़ी समस्याओं को रोकने में मदद मिल सकती है।
डिजिटल धोखाधड़ी के मामलों में भी पूरी बैंकिंग व्यवस्था की भूमिका महत्वपूर्ण है। कई बार ग्राहक यह समझ नहीं पाते कि धोखाधड़ी किस बैंक में शुरू हुई, पैसा किन खातों से होकर गुजरा और आखिरकार कहां पहुंचा। ऐसी परिस्थितियों में केवल एक बैंक की कार्रवाई पर्याप्त नहीं हो सकती। वित्तीय संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय और शिकायतों के प्रभावी विश्लेषण से धोखाधड़ी की पहचान और रोकथाम में मदद मिल सकती है।
गौरतलब है कि भारतीय बैंकिंग व्यवस्था ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी वित्तीय स्थिति और पूंजी संबंधी मजबूती में सुधार किया है। स्वामीनाथन जे ने इस बात पर जोर दिया कि भविष्य में विकास करते समय इन मजबूती को बनाए रखना भी जरूरी है। बैंकों की सफलता केवल तेजी से कारोबार बढ़ाने या नई तकनीक अपनाने से तय नहीं होगी, बल्कि सुरक्षित कामकाज, ग्राहकों के साथ निष्पक्ष व्यवहार और भरोसे को कायम रखने से भी तय होगी।
कुल मिलाकर, RBI के डिप्टी गवर्नर का संदेश साफ है कि AI और डिजिटल तकनीक बैंकिंग क्षेत्र को नई संभावनाएं दे सकती हैं, लेकिन इनके इस्तेमाल के साथ सुरक्षा और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। बैंकों को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें तकनीक से काम आसान हो, ग्राहकों का डेटा सुरक्षित रहे और धोखाधड़ी की आशंका को समय रहते पहचाना जा सके। अब बैंकिंग क्षेत्र के सामने चुनौती केवल तकनीक अपनाने की नहीं, बल्कि उसका जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करने की भी है।


