इजरायल में बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक मुश्किलों के बीच अब पूरी दुनिया की नजरें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर टिक गई हैं। अमेरिका में होने जा रहे मध्यावधि चुनाव केवल संसद के सदस्यों को चुनने का मुकाबला नहीं हैं, बल्कि इन चुनावों से यह भी तय होगा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने कार्यकाल के अगले दो वर्षों में कितनी राजनीतिक ताकत के साथ फैसले ले पाएंगे। अगर इन चुनावों में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका लगता है और डेमोक्रेटिक पार्टी संसद में बहुमत हासिल कर लेती है, तो व्हाइट हाउस में बैठे ट्रंप के सामने कई नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। यही वजह है कि इन चुनावों पर केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि भारत समेत पूरी दुनिया की नजरें लगी हुई हैं। सवाल यह है कि आखिर अमेरिका के मध्यावधि चुनाव इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं और अगर ट्रंप की पार्टी चुनाव हार जाती है तो उनके लिए आगे क्या मुश्किलें पैदा हो सकती हैं?
दरअसल, अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव हर चार साल में होता है, जबकि अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के चुनाव प्रत्येक दो साल में कराए जाते हैं। जब राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच में ये चुनाव होते हैं, तो इन्हें मध्यावधि चुनाव कहा जाता है। इन चुनावों में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की लगभग एक तिहाई सीटों पर मुकाबला होता है। अमेरिका की संसद के दो सदन हैं। पहला प्रतिनिधि सभा और दूसरा सीनेट। प्रतिनिधि सभा को भारत की लोकसभा और सीनेट को राज्यसभा के समान समझा जा सकता है, हालांकि दोनों देशों की संसदीय व्यवस्थाओं में कई महत्वपूर्ण अंतर हैं। प्रतिनिधि सभा के सदस्यों का चुनाव दो साल के लिए होता है, जबकि सीनेटर छह साल के लिए चुने जाते हैं।
फिलहाल अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी का नियंत्रण है। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि उनकी पार्टी अपना बहुमत बरकरार रखे, ताकि सरकार की नीतियों और विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने में उन्हें संसद का समर्थन मिलता रहे। दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक पार्टी दोनों सदनों में अपनी स्थिति मजबूत करने और रिपब्लिकन बहुमत को चुनौती देने की कोशिश कर रही है। इस चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों की बात करें तो महंगाई, आम लोगों की आर्थिक स्थिति, रोजगार, ईंधन की कीमतें और ट्रंप की आयात शुल्क यानी टैरिफ नीतियां प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं। अमेरिकी मतदाताओं के बीच यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि मौजूदा आर्थिक नीतियों का उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पर क्या असर पड़ रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी चुनाव हार जाती है तो क्या होगा? सबसे पहले समझिए कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव हारने और मध्यावधि चुनाव हारने में बहुत बड़ा अंतर है। मध्यावधि चुनाव में हारने का मतलब यह नहीं है कि डोनाल्ड ट्रंप को तुरंत राष्ट्रपति पद छोड़ना पड़ेगा। उनका राष्ट्रपति पद का चार साल का कार्यकाल जारी रहेगा। लेकिन अगर डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा या सीनेट में बहुमत हासिल कर लेती है, तो ट्रंप के लिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना पहले की तुलना में कठिन हो सकता है। विपक्षी पार्टी संसद में सरकारी नीतियों की जांच कर सकती है, प्रशासन से जवाब मांग सकती है और विभिन्न समितियों के माध्यम से राष्ट्रपति के फैसलों पर निगरानी बढ़ा सकती है।
इसके अलावा बजट, सरकारी खर्च और नए कानूनों को पारित कराने में भी राष्ट्रपति को विपक्ष के साथ बातचीत और समझौता करना पड़ सकता है। अगर डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल करती है, तो वह महत्वपूर्ण संसदीय समितियों का नेतृत्व अपने हाथ में ले सकती है। इससे ट्रंप प्रशासन की नीतियों और फैसलों की जांच का दायरा बढ़ सकता है। यहां तक कि प्रतिनिधि सभा के पास महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की संवैधानिक शक्ति भी है, हालांकि राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए सीनेट में दोषसिद्धि आवश्यक होती है। यानी चुनावी हार ट्रंप की सत्ता तुरंत खत्म नहीं करेगी, लेकिन उनके राजनीतिक फैसलों पर लगाम जरूर लगा सकती है।
दूसरी तरफ अगर रिपब्लिकन पार्टी अपना बहुमत बचाने में सफल रहती है, तो ट्रंप को अपने कार्यकाल के अगले दो वर्षों में विधायी समर्थन बनाए रखने में आसानी हो सकती है। इसलिए यह चुनाव उनके लिए राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इन चुनावों का असर दिखाई दे सकता है, क्योंकि अमेरिका की व्यापार, विदेश नीति और दूसरे देशों के साथ संबंधों से जुड़ी नीतियों पर संसद का रुख महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। खासकर भारत जैसे देशों के लिए भी अमेरिकी चुनाव के नतीजे महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार, रक्षा, तकनीक और रणनीतिक सहयोग जैसे कई अहम मुद्दे जुड़े हुए हैं।
हालांकि चुनाव के परिणाम आने से अमेरिकी विदेश नीति में तत्काल और पूरी तरह बदलाव हो जाएगा, ऐसा मानना सही नहीं होगा। फिलहाल मुकाबला बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर है। एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप अपनी पार्टी का बहुमत बचाने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं, तो दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक पार्टी सत्ता के संतुलन को बदलने की कोशिश में जुटी है। अब देखना होगा कि अमेरिकी मतदाता ट्रंप की नीतियों पर अपना भरोसा जताते हैं या फिर संसद में विपक्ष को मजबूत करने का फैसला लेते हैं। इन चुनावों का परिणाम अमेरिका की राजनीति के साथ-साथ आने वाले दो वर्षों में डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक ताकत की दिशा भी तय करेगा।


