भारतीय महिला हॉकी की युवा ब्रिगेड अपने पहले विश्व कप को लेकर बेहद उत्साहित है। टीम में शामिल कई युवा खिलाड़ियों के लिए यह सिर्फ एक बड़ा टूर्नामेंट नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, संघर्ष और त्याग का परिणाम है। इशिका, लालथांटलुआंगी, साक्षी राणा, शिल्पी डबास और सुनेलिटा टोप्पो जैसी खिलाड़ियों ने कम उम्र में ही हॉकी के मैदान पर अपनी अलग पहचान बनाई है। पहली बार विश्व कप खेलने का मौका मिलने से इन खिलाड़ियों में उत्साह के साथ-साथ थोड़ी घबराहट भी है।
21 वर्षीय इशिका के लिए विश्व कप तक पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा। उन्होंने बचपन से ही हॉकी को अपने जीवन का हिस्सा बनाया और उनके पिता उनके शुरुआती कोच रहे। परिवार का लगातार सहयोग मिलने के बावजूद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती मानसिक रूप से मजबूत बने रहने की थी। चोटों और मुश्किल दौर ने उन्हें कई बार परखा, लेकिन उन्होंने इन परिस्थितियों से सीख लेते हुए अपना आत्मविश्वास मजबूत किया। अब उनकी कोशिश विश्व कप के बड़े मंच पर टीम के लिए गोल के मौके तैयार करने की होगी।
इशिका का कहना है कि विश्व कप में खेलना हर हॉकी खिलाड़ी का सपना होता है और अब जब उनका सपना पूरा होने जा रहा है, तो उन्हें इस पल का बेसब्री से इंतजार है। उनके लिए यह टूर्नामेंट अपने अब तक के सफर को साबित करने का एक बड़ा अवसर भी है। मानसिक मजबूती और सकारात्मक सोच के साथ वह मैदान पर अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए तैयार हैं।
21 वर्षीय डिफेंडर लालथांटलुआंगी के लिए भारतीय विश्व कप टीम में जगह बनाना बेहद भावुक पल रहा। उनके मुताबिक यह उपलब्धि केवल उनकी नहीं बल्कि उनके पूरे परिवार की है। स्कूल और हॉकी अभ्यास के बीच तालमेल बैठाते हुए उन्होंने कम उम्र में ही अनुशासन और संतुलन सीख लिया था। अब वह विश्व कप में देश के लिए अपना शत प्रतिशत देने का लक्ष्य लेकर मैदान में उतरेंगी।
लालथांटलुआंगी ने टीम की वरिष्ठ खिलाड़ियों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना है कि सीनियर खिलाड़ियों ने उन्हें दबाव से निपटना सिखाया और मैदान के अंदर तथा बाहर लगातार नई चीजें सीखने का अवसर दिया। युवा खिलाड़ियों के लिए वरिष्ठों का अनुभव बड़े टूर्नामेंट में काफी मददगार साबित हो सकता है।
19 वर्षीय मिडफील्डर साक्षी राणा भी अपने पहले विश्व कप को लेकर रोमांचित हैं। वह मानती हैं कि पहली बार इतने बड़े मंच पर उतरने को लेकर नर्वस होना स्वाभाविक है, लेकिन इस घबराहट को सकारात्मक ऊर्जा में बदलना जरूरी है। साक्षी का लक्ष्य डिफेंस और फॉरवर्ड लाइन के बीच मजबूत कड़ी बनना है, ताकि टीम को आक्रमण और बचाव दोनों में संतुलन मिल सके।
शिल्पी डबास की कहानी भी संघर्ष और इंतजार से भरी रही है। उन्हें राष्ट्रीय शिविर में शामिल होने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। हॉकी इंडिया लीग के दूसरे सत्र के बाद उन्हें शिविर में चुना गया और इसके बाद उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का बड़ा मंच मिला। वह युवा खिलाड़ियों को संदेश देती हैं कि अगर मौका देर से मिले तो भी हार नहीं माननी चाहिए। लगातार मेहनत करते रहने से किसी न किसी समय अवसर जरूर मिलता है।
डबास के लिए हॉकी सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि परिवार की विरासत भी है। उनकी मां, पिता और भाई सभी हॉकी से जुड़े रहे हैं। छठी कक्षा से हॉकी खेलने वाली डबास अब विश्व कप जैसे बड़े मंच पर अपने परिवार और देश का नाम रोशन करना चाहती हैं। सीनियर खिलाड़ियों और कोचों से मिली सलाह ने भी उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया है।
19 वर्षीय सुनेलिटा टोप्पो अपनी तेज रफ्तार को टीम की सबसे बड़ी ताकत बनाना चाहती हैं। विंग पोजिशन पर खेलने वाली टोप्पो का लक्ष्य है कि वह अपनी स्पीड का इस्तेमाल करते हुए गेंद को जल्द से जल्द स्ट्राइकर तक पहुंचाएं और टीम के लिए गोल के मौके तैयार करें। वह अब तक की ट्रेनिंग को विश्व कप में पूरी तरह इस्तेमाल करना चाहती हैं।
इन युवा खिलाड़ियों की कहानियां बताती हैं कि भारतीय महिला हॉकी की नई पीढ़ी सिर्फ प्रतिभा के दम पर नहीं, बल्कि संघर्ष, अनुशासन और मानसिक मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है। पहली बार विश्व कप खेलने का दबाव जरूर है, लेकिन सीनियर खिलाड़ियों का अनुभव और कोचों का मार्गदर्शन इनके आत्मविश्वास को मजबूत कर रहा है। अब नजरें इस बात पर हैं कि भारतीय महिला हॉकी की यह युवा ब्रिगेड विश्व कप के बड़े मंच पर अपने सपनों को किस तरह प्रदर्शन में बदलती है।


