पटियाला में पिटबुल के हमले की घटना सामने आने के बाद देश में एक बार फिर खतरनाक मानी जाने वाली डॉग ब्रीड्स को लेकर बहस तेज हो गई है। पिटबुल और रॉटविलर जैसी ताकतवर नस्लों को लेकर अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि क्या इन्हें भारत में पालना पूरी तरह प्रतिबंधित है या इनके लिए कुछ विशेष नियम लागू हैं। सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर कई तरह की जानकारियां सामने आती रहती हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति इतनी आसान नहीं है। केंद्र के निर्देश, अदालत में चल रही कानूनी प्रक्रिया और अलग-अलग स्थानीय निकायों के नियमों के कारण इस विषय को समझने में लोगों को परेशानी होती है।
देश में डॉग बाइट की घटनाएं लंबे समय से चिंता का विषय रही हैं। खास तौर पर ऐसी घटनाएं ज्यादा चर्चा में आती हैं, जिनमें पिटबुल या रॉटविलर जैसी शक्तिशाली नस्लों के कुत्ते शामिल होते हैं। इन नस्लों की शारीरिक ताकत अधिक होने के कारण किसी हमले में चोट गंभीर हो सकती है। यही वजह है कि इनके प्रजनन, बिक्री और पालन को लेकर कई स्तरों पर नियम बनाने की मांग होती रही है।
साल 2024 में केंद्र सरकार की ओर से कुछ ऐसी डॉग ब्रीड्स के खिलाफ कार्रवाई की दिशा में कदम उठाया गया था, जिन्हें खतरनाक माना गया। इसमें पिटबुल टेरियर, रॉटविलर, अमेरिकन बुलडॉग समेत कई नस्लों का उल्लेख किया गया था। केंद्र की ओर से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इन नस्लों की बिक्री, प्रजनन और रखने पर रोक से संबंधित निर्देश दिए गए थे। इसके बाद इस फैसले को लेकर डॉग ओनर्स और अन्य पक्षों की ओर से विरोध किया गया और मामला कानूनी विवाद में पहुंच गया।
यहीं से पिटबुल बैन को लेकर सबसे ज्यादा भ्रम पैदा हुआ। कई लोगों को लगता है कि पिटबुल पर पूरे भारत में एक जैसा प्रतिबंध लागू है, जबकि स्थिति इससे ज्यादा जटिल है। किसी स्थानीय निकाय या राज्य में विशेष नियम लागू हो सकते हैं, लेकिन पूरे देश में किसी एक नस्ल को लेकर एक समान व्यवस्था होने की बात अलग विषय है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को अपने शहर या राज्य के मौजूदा नियमों की जानकारी जरूर लेनी चाहिए।
पटियाला में सामने आई घटना ने इसी बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, एक दंपति मकान देखने के लिए एक स्थान पर पहुंचा था। इसी दौरान वहां मौजूद पिटबुल ने उन पर हमला कर दिया। हमले में दोनों घायल हुए और महिला को गंभीर चोटें आने की जानकारी सामने आई। घटना के बाद पालतू कुत्तों को रखने और उनकी निगरानी को लेकर स्थानीय स्तर पर भी सवाल उठने लगे।
इस तरह की घटनाओं में सिर्फ कुत्ते की नस्ल पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। कुत्ते को पालने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। मालिक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पालतू जानवर किसी दूसरे व्यक्ति के लिए खतरा न बने। घर में आने वाले मेहमानों, बच्चों, पड़ोसियों और सार्वजनिक स्थानों पर मौजूद लोगों की सुरक्षा का ध्यान रखना भी डॉग ओनर की जिम्मेदारी है।
कुत्ते के व्यवहार पर उसकी नस्ल के अलावा ट्रेनिंग, वातावरण, देखभाल और सामाजिक व्यवहार का भी प्रभाव पड़ता है। किसी भी कुत्ते को बिना प्रशिक्षण और पर्याप्त नियंत्रण के छोड़ना जोखिम पैदा कर सकता है। खास तौर पर बड़ी और ताकतवर नस्लों के मामले में मालिकों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि कुत्ते को पालने से पहले स्थानीय नियमों की जानकारी लेना जरूरी है। नगर निगम, स्थानीय प्रशासन या संबंधित विभाग की ओर से रजिस्ट्रेशन, लाइसेंस, सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा और अन्य शर्तें लागू हो सकती हैं। नियमों की अनदेखी करने पर स्थानीय कानून के अनुसार कार्रवाई भी हो सकती है।
पिटबुल और रॉटविलर को लेकर बहस में एक पक्ष पूरी तरह प्रतिबंध की मांग करता है, जबकि दूसरा पक्ष जिम्मेदार पालन, प्रशिक्षण और सख्त सुरक्षा नियमों को बेहतर विकल्प मानता है। ऐसे में सरकार और स्थानीय प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ पालतू जानवरों से जुड़े नियमों को स्पष्ट और प्रभावी बनाया जाए।
पटियाला की घटना ने यह सवाल जरूर सामने ला दिया है कि भारत में खतरनाक मानी जाने वाली डॉग ब्रीड्स को लेकर नियम आखिर कितने स्पष्ट हैं। अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग व्यवस्था होने के कारण आम लोगों के बीच भ्रम की स्थिति बनी रहती है। इसलिए किसी भी नस्ल को लेकर दावा करने से पहले संबंधित क्षेत्र के मौजूदा नियम और आधिकारिक आदेश देखना जरूरी है।
फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे अहम मुद्दा लोगों की सुरक्षा और जिम्मेदार पेट ओनरशिप का है। पिटबुल हो या रॉटविलर या कोई अन्य बड़ी नस्ल, उसे पालने वाले व्यक्ति को उसकी पूरी जिम्मेदारी लेनी होती है। वहीं, खतरनाक मानी जाने वाली नस्लों को लेकर देशभर में स्पष्ट और व्यावहारिक नियम बनाए जाने की मांग आने वाले समय में और तेज हो सकती है।


