भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देशभक्ति से जुड़ी फिल्मों और वेबसीरीज के बदलते अंदाज की चर्चा तेज है। एक दौर था जब देशभक्ति की फिल्मों में मुख्य रूप से युद्ध, दुश्मन को हराने वाले सैनिक और जोशीले संवादों को केंद्र में रखा जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस तरह की कहानियों का नजरिया काफी बदला है। अब फिल्मकार सिर्फ युद्धभूमि की वीरता दिखाने के बजाय सैनिकों की निजी जिंदगी, परिवार, रिश्तों, भावनाओं और उनके सामने आने वाली चुनौतियों को भी कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहे हैं। ‘राजी’, ‘शेरशाह’ और ‘अमरन’ जैसी फिल्मों ने इस बदलाव को दर्शकों के सामने प्रभावी तरीके से पेश किया है।
2018 में रिलीज हुई ‘राजी’ को देशभक्ति सिनेमा में बदलाव की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिना जाता है। मेघना गुलजार के निर्देशन में बनी इस फिल्म में एक महिला जासूस की कहानी दिखाई गई, जो देश की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान जाती है। लेकिन फिल्म का फोकस केवल जासूसी मिशन या भारत-पाकिस्तान तनाव तक सीमित नहीं रहा। कहानी में मुख्य किरदार के निजी रिश्तों, भावनात्मक संघर्ष और परिवार से जुड़े पहलुओं को भी प्रमुखता दी गई। यही वजह रही कि दर्शकों को देशभक्ति की कहानी के साथ एक मानवीय पक्ष भी देखने को मिला।
इसके बाद ‘शेरशाह’ ने भी देशभक्ति की कहानियों को एक अलग नजरिया दिया। फिल्म में परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा की जिंदगी और कारगिल युद्ध में उनके योगदान को दिखाया गया। फिल्म में युद्ध और सैन्य अभियानों के साथ विक्रम बत्रा की निजी जिंदगी, उनके परिवार और प्रेम संबंधों को भी कहानी का हिस्सा बनाया गया। इससे दर्शकों को यह समझने का मौका मिला कि सीमा पर देश के लिए लड़ने वाला सैनिक भी भावनाओं, रिश्तों और व्यक्तिगत सपनों से जुड़ा एक सामान्य इंसान होता है।
इसी तरह ‘अमरन’ ने भी सैनिक की जिंदगी के भावनात्मक पक्ष को सामने रखा। फिल्म में मेजर मुकुंद वरदराजन की कहानी के माध्यम से उनके सैन्य जीवन के साथ परिवार और व्यक्तिगत रिश्तों को प्रमुखता दी गई। कहानी में यह दिखाने की कोशिश की गई कि एक सैनिक के लिए देश सेवा जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण उसके पीछे छूट जाने वाले परिवार की भावनाएं और संघर्ष भी हैं।
देशभक्ति फिल्मों में यह बदलाव केवल फिल्मों तक सीमित नहीं है। ओटीटी प्लेटफॉर्म ने भी ऐसी कहानियों को दर्शकों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वेबसीरीज और डिजिटल फिल्मों में अब सैनिकों के जीवन के उन पहलुओं को भी दिखाया जा रहा है, जिन्हें पारंपरिक युद्ध फिल्मों में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता था। सैनिकों की मानसिक स्थिति, परिवार से दूरी, निजी फैसले और ड्यूटी के बीच संतुलन जैसे विषय भी कहानी का हिस्सा बन रहे हैं।
हालांकि बड़े बजट की युद्ध आधारित फिल्मों का आकर्षण अभी भी कायम है। ‘बॉर्डर 2’ और ‘धुरंधर’ जैसी परियोजनाओं में बड़े पैमाने के एक्शन, युद्ध दृश्यों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों को महत्व दिया जा रहा है। इन फिल्मों का उद्देश्य दर्शकों को बड़े पर्दे पर भव्य सैन्य दृश्य और रोमांचक कहानी का अनुभव देना है। लेकिन इसके साथ ही ‘इक्कीस’, ‘अमरन’ और ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ जैसी परियोजनाएं सैनिकों की व्यक्तिगत और भावनात्मक यात्रा को भी सामने लाने की कोशिश कर रही हैं।
इस बदलाव का एक कारण दर्शकों की बदलती पसंद भी मानी जा सकती है। आज का दर्शक सिर्फ यह नहीं देखना चाहता कि युद्ध में कौन जीता और किसने दुश्मन को हराया। वह यह भी जानना चाहता है कि उस जीत के पीछे किन लोगों की जिंदगी प्रभावित हुई, सैनिकों ने किन परिस्थितियों का सामना किया और उनके परिवारों पर इसका क्या असर पड़ा। यही वजह है कि देशभक्ति की कहानियों में भावनात्मक गहराई बढ़ती दिखाई दे रही है।
दरअसल, राष्ट्रवाद और मानवीय संवेदनाओं को एक साथ पेश करने वाली फिल्मों की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे सैनिकों को सिर्फ एक योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक इंसान के रूप में दिखाती हैं। उनके सपने होते हैं, परिवार होते हैं, दोस्त होते हैं और अपने भविष्य को लेकर उम्मीदें होती हैं। जब वे देश की रक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगाते हैं, तो उनके पीछे परिवार भी कई तरह की भावनात्मक चुनौतियों से गुजरता है।
भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देशभक्ति सिनेमा का यह बदलता स्वरूप बताता है कि राष्ट्रप्रेम की कहानियां अब सिर्फ युद्ध और जीत तक सीमित नहीं रह गई हैं। ‘राजी’ से लेकर ‘शेरशाह’ और ‘अमरन’ तक फिल्मों ने यह दिखाया है कि देशभक्ति को मानवीय रिश्तों और भावनाओं के साथ भी प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता है। आने वाले समय में ‘बॉर्डर 2’ और ‘इक्कीस’ जैसी परियोजनाएं इस बदलाव को किस दिशा में आगे ले जाती हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल इतना जरूर है कि भारतीय सिनेमा में देशभक्ति की कहानी अब सिर्फ सीमा पर लड़ी जाने वाली लड़ाई नहीं रही, बल्कि उन लोगों की जिंदगी की कहानी भी बन रही है, जो देश की सुरक्षा के लिए अपने व्यक्तिगत सुख और रिश्तों को पीछे छोड़ देते हैं।


