भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड यानी SEBI ने अपनी निपटान व्यवस्था में व्यापक बदलाव का प्रस्ताव रखा है। पूंजी बाजार नियामक की ओर से जारी परामर्श पत्र में 10 लाख रुपये तक की निपटान राशि वाले मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक व्यवस्था शुरू करने का सुझाव दिया गया है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य नियामकीय मामलों के निपटान की प्रक्रिया को आसान, तेज और अधिक स्पष्ट बनाना है। सेबी ने प्रस्तावित बदलावों पर आम लोगों, बाजार से जुड़े पक्षों और अन्य हितधारकों से 4 सितंबर तक टिप्पणियां मांगी हैं।
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 10 लाख रुपये तक की निपटान राशि वाले मामलों को अलग प्रक्रिया के जरिए जल्दी निपटाने की कोशिश की जाएगी। ऐसे मामलों में उच्चाधिकार प्राप्त सलाहकार समिति यानी HPAC की बैठक की जरूरत नहीं होगी। इसके बजाय मामले आंतरिक समिति से सीधे सेबी के पूर्णकालिक सदस्यों के पैनल के पास भेजे जा सकेंगे। इससे छोटे निपटान मामलों में प्रक्रिया को कम समय में पूरा करने का रास्ता खुल सकता है।
सेबी ने मौजूदा निपटान व्यवस्था में भी कई बदलाव सुझाए हैं। नियामक ने मौजूदा सेबी निपटान कार्यवाही विनियम, 2018 की जगह नया ढांचा तैयार करने का प्रस्ताव रखा है। इसका उद्देश्य निपटान प्रक्रिया को ज्यादा व्यवस्थित बनाने के साथ-साथ अलग-अलग मामलों में राशि तय करने की प्रक्रिया को भी अधिक स्पष्ट करना है।
सेबी के अध्ययन में निपटान राशि और बाद में लगाए गए जुर्माने के बीच अंतर को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। अध्ययन के मुताबिक, जिन मामलों में निपटान प्रस्ताव खारिज या वापस ले लिया गया और बाद में नियामकीय कार्रवाई के दौरान जुर्माना लगाया गया, उनमें प्रस्तावित निपटान राशि अंतिम जुर्माने की राशि से औसतन करीब आठ गुना अधिक थी। नए प्रस्ताव के तहत इस अनुपात को घटाकर करीब चार गुना करने की योजना है। इससे निपटान राशि तय करने की व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाने की कोशिश की जा रही है।
नियामक ने निपटान राशि को प्रतिभूति कानूनों के तहत निर्धारित न्यूनतम जुर्माने से जोड़ने का भी प्रस्ताव रखा है। इसके अलावा आवेदक की श्रेणी के आधार पर अलग-अलग गुणक लागू करने की योजना है। हालांकि गलत तरीके से अर्जित लाभ या निवेशकों को हुए नुकसान की अलग से वसूली जारी रहेगी। यानी निपटान राशि में बदलाव का मतलब यह नहीं होगा कि किसी मामले में अनुचित तरीके से हासिल किए गए लाभ या निवेशकों को हुए नुकसान की भरपाई से छूट मिल जाएगी।
सेबी ने राहत देने वाले कारकों को लेकर भी बदलाव सुझाए हैं। मौजूदा व्यवस्था में अधिकतम तीन राहत देने वाले कारकों को ध्यान में रखा जाता है, जिसे बढ़ाकर पांच करने का प्रस्ताव है। संभावित कारकों में कंपनी के नियंत्रण या प्रबंधन में बदलाव और आवेदक का स्वतंत्र निदेशक होना जैसे पहलू शामिल किए जा सकते हैं। इससे मामले की परिस्थितियों के आधार पर निपटान राशि तय करने में ज्यादा लचीलापन आ सकता है।
गलत तरीके से अर्जित लाभ की वापसी पर ब्याज को लेकर भी सेबी ने नया प्रस्ताव रखा है। अगर अंतिम आदेश जारी नहीं हुआ है तो लेनदेन की तारीख से निपटान आवेदन दाखिल करने तक 9 प्रतिशत सालाना ब्याज लगाने का प्रस्ताव है। वहीं अगर अंतिम आदेश पहले ही जारी हो चुका है तो लेनदेन की तारीख से आदेश जारी होने तक 9 प्रतिशत और उसके बाद निपटान आवेदन दाखिल करने तक 12 प्रतिशत सालाना ब्याज लगाने का सुझाव दिया गया है।
प्रस्ताव में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ब्याज पर ब्याज यानी चक्रवृद्धि ब्याज नहीं लिया जाएगा। इससे निपटान राशि और ब्याज की गणना को अधिक स्पष्ट बनाने की कोशिश की गई है। इसके अलावा लंबित मामलों में निपटान आवेदन दाखिल करने की मौजूदा 60 दिन की समयसीमा को बढ़ाने का भी प्रस्ताव रखा गया है।
सेबी की ओर से प्रस्तावित ये बदलाव अभी अंतिम नियम नहीं हैं। नियामक ने परामर्श पत्र जारी कर सार्वजनिक टिप्पणियां आमंत्रित की हैं और 4 सितंबर तक मिलने वाली प्रतिक्रियाओं के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय की जा सकती है। अगर प्रस्तावित बदलाव लागू होते हैं तो छोटे निपटान मामलों को तेजी से निपटाने में मदद मिल सकती है और नियामकीय प्रक्रिया को अधिक सरल बनाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।


