मेरठ की पहचान कभी सिर्फ क्रिकेट बैट बनाने वाले शहर के तौर पर की जाती थी, लेकिन अब यहां की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री ने अपनी पहचान का दायरा काफी बढ़ा लिया है। क्रिकेट के बल्लों से आगे बढ़ते हुए मेरठ में हॉकी स्टिक, फुटबॉल, वॉलीबॉल और कई दूसरे खेल उपकरण भी बड़े पैमाने पर तैयार किए जा रहे हैं। खास बात यह है कि मेरठ में तैयार होने वाला यह खेल सामान अब सिर्फ देश के अलग-अलग हिस्सों तक नहीं, बल्कि विदेशों के बाजारों तक भी पहुंच रहा है।
इस बदलाव में सरकारी योजनाओं को भी अहम वजह माना जा रहा है। खास तौर पर ओडीओपी यानी ‘एक जिला, एक उत्पाद’ योजना ने मेरठ के खेल सामान उद्योग को नई दिशा देने में मदद की है। इस योजना के जरिए स्थानीय उत्पादों और कारोबारियों को बढ़ावा देने की कोशिश की गई है, जिसका असर मेरठ की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री में भी देखने को मिल रहा है।
मेरठ के छोटे और मध्यम कारोबारियों के लिए सरकारी सहायता ने कारोबार को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मशीनरी खरीदने पर सब्सिडी और कारोबार विस्तार के लिए उपलब्ध वित्तीय सहायता ने कई यूनिट्स को अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने का मौका दिया है। इसके अलावा ब्याज मुक्त लोन जैसी सुविधाओं से भी कारोबारियों को राहत मिली है और नई यूनिट लगाने या मौजूदा कारोबार को विस्तार देने का रास्ता आसान हुआ है।
आज मेरठ में करीब 5 से 7 हजार छोटी-बड़ी स्पोर्ट्स यूनिट्स सक्रिय होने का दावा किया जा रहा है। इन यूनिट्स में बड़ी संख्या में अलग-अलग तरह के खेल उपकरण तैयार किए जाते हैं। क्रिकेट बैट और बॉल से लेकर हॉकी स्टिक, फुटबॉल, वॉलीबॉल और दूसरे स्पोर्ट्स गुड्स तक, मेरठ का उद्योग लगातार अपने उत्पादों की रेंज बढ़ा रहा है।
मेरठ की इस इंडस्ट्री की सबसे बड़ी ताकत उसकी उत्पादन क्षमता और स्थानीय स्तर पर मौजूद विशेषज्ञता है। कई दशकों से खेल उपकरण तैयार करने वाले कारीगरों और कारोबारियों ने अपने अनुभव के दम पर इस उद्योग को मजबूत बनाया है। अब सरकारी योजनाओं और आधुनिक मशीनों की मदद मिलने से पारंपरिक कौशल को नई तकनीक के साथ जोड़ा जा रहा है।
इसका असर निर्यात के आंकड़ों में भी दिखाई देता है। मेरठ से हर साल करीब 975 करोड़ रुपये के खेल सामान का निर्यात होने की बात सामने आई है। ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और अमेरिका समेत कई देशों में मेरठ में तैयार किए गए खेल उपकरण पहुंच रहे हैं। यानी जिस शहर की पहचान कभी घरेलू क्रिकेट बाजार तक सीमित समझी जाती थी, वही शहर अब अंतरराष्ट्रीय खेल सामान बाजार में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है।
मेरठ की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री के विस्तार का फायदा सिर्फ बड़े कारोबारियों तक सीमित नहीं है। छोटी यूनिट्स, कारीगरों, पैकेजिंग से जुड़े लोगों और दूसरे स्थानीय कामगारों के लिए भी इससे रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं। जब उत्पादन बढ़ता है और विदेशी बाजारों से मांग आती है, तो पूरी सप्लाई चेन में काम बढ़ने की संभावना रहती है।
सरकारी योजनाओं के साथ-साथ मेरठ के कारोबारियों की मेहनत और स्थानीय उद्योग का अनुभव भी इस सफलता के पीछे बड़ी वजह है। लंबे समय से खेल उपकरण बनाने वाले कारोबारी अब बदलती बाजार की जरूरतों के अनुसार नए उत्पाद और बेहतर गुणवत्ता पर जोर दे रहे हैं। यही वजह है कि मेरठ का स्पोर्ट्स कारोबार धीरे-धीरे एक बड़े औद्योगिक क्लस्टर का रूप लेता नजर आ रहा है।
मेरठ की कहानी यह भी दिखाती है कि स्थानीय स्तर पर मौजूद पारंपरिक उद्योग को अगर बाजार, तकनीक और सरकारी सहायता का साथ मिले, तो वह बड़े स्तर पर अपनी पहचान बना सकता है। ओडीओपी जैसी योजनाओं के जरिए स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की कोशिश और कारोबारियों को मिलने वाली सहायता ने इस क्षेत्र को नई गति दी है।
आज मेरठ में बनने वाला खेल सामान देश के खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों तक पहुंचने के साथ-साथ विदेशों में भी अपनी जगह बना रहा है। हजारों स्पोर्ट्स यूनिट्स और करोड़ों रुपये के निर्यात के साथ मेरठ की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री अब सिर्फ एक स्थानीय कारोबार नहीं रह गई है। क्रिकेट बैट से शुरू हुई पहचान अब हॉकी, फुटबॉल, वॉलीबॉल और दूसरे खेल उपकरणों तक फैल चुकी है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मेरठ के खेल सामान की मांग इस शहर की बदलती औद्योगिक तस्वीर को सामने रख रही है।


