राजनीतिक गलियारों में एक ऐसा सर्वे सामने आया है, जिसने कई लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इंडिया टुडे-सीवोटर के मूड ऑफ द नेशन यानी MOTN सर्वे में प्रधानमंत्री पद की पसंद को लेकर अभिजीत दिपके ने आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल को पीछे छोड़ दिया है। दोनों के बीच अंतर बेहद मामूली है, लेकिन इस आंकड़े ने राजनीतिक चर्चा जरूर तेज कर दी है।
सर्वे के मुताबिक, प्रधानमंत्री पद के लिए अभिजीत दिपके को 1.3 प्रतिशत लोगों का समर्थन मिला है, जबकि अरविंद केजरीवाल को 1.2 प्रतिशत समर्थन मिला। यानी दोनों के बीच सिर्फ 0.1 प्रतिशत अंक का अंतर है। आंकड़ा छोटा जरूर है, लेकिन दिपके के राजनीतिक सफर को देखते हुए इसे दिलचस्प माना जा रहा है।
अभिजीत दिपके का नाम पिछले कुछ समय में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी CJP के साथ चर्चा में आया है। वह इस राजनीतिक संगठन के संस्थापक और संयोजक हैं। इससे पहले वह आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे थे और साल 2020 से 2023 के बीच अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली AAP की कम्युनिकेशन टीम के साथ काम कर चुके हैं।
यानी जिस नेता के साथ दिपके ने कभी राजनीतिक कम्युनिकेशन के स्तर पर काम किया था, उसी नेता को अब एक सर्वे में प्रधानमंत्री पद की पसंद के मामले में उन्होंने मामूली अंतर से पीछे छोड़ दिया है। यही वजह है कि MOTN के इस आंकड़े को सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में खास तौर पर देखा जा रहा है।
दिपके का राजनीतिक सफर भी पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदला है। पहले वह राजनीतिक कम्युनिकेशन से जुड़े प्रोफेशनल के तौर पर काम कर रहे थे, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी बनाने का फैसला किया। CJP के जरिए उन्होंने युवाओं से जुड़े मुद्दों और दबाव वाले आंदोलनों को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाने की कोशिश की है।
कॉकरोच जनता पार्टी का नाम भी अपने आप में काफी अलग है। पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग नाम और शैली के कारण यह संगठन सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान आकर्षित करता रहा है। पार्टी की गतिविधियों और दिपके के बयानों को लेकर खासकर युवाओं के बीच चर्चा देखने को मिलती है।
हालांकि, यहां यह समझना भी जरूरी है कि MOTN सर्वे में 1.3 प्रतिशत और 1.2 प्रतिशत का समर्थन राष्ट्रीय स्तर पर बेहद छोटा आंकड़ा है। इसे इस रूप में नहीं देखा जा सकता कि अभिजीत दिपके प्रधानमंत्री पद की मुख्य दावेदारी में अचानक सबसे आगे आ गए हैं। सर्वे में कई बड़े राष्ट्रीय नेताओं की तुलना में दोनों का समर्थन काफी कम है।
फिर भी दिपके का केजरीवाल से आगे निकलना उनके लिए राजनीतिक रूप से एक दिलचस्प संकेत जरूर है। खासकर इसलिए क्योंकि केजरीवाल भारतीय राजनीति में लंबे समय से सक्रिय और राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले नेता हैं। वहीं दिपके अपेक्षाकृत नए राजनीतिक चेहरे हैं और उनका संगठन अभी पारंपरिक बड़े राजनीतिक दलों की तुलना में काफी छोटा है।
सर्वे के आंकड़े यह भी बताते हैं कि राजनीति में नए चेहरों और नए राजनीतिक प्रयोगों के लिए कुछ जगह मौजूद है। सोशल मीडिया और युवा केंद्रित आंदोलनों के दौर में ऐसे चेहरे तेजी से चर्चा में आ सकते हैं, जो पारंपरिक राजनीति से अलग तरीके से अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
दिपके के लिए यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने AAP की कम्युनिकेशन टीम में काम करने के बाद अपना अलग राजनीतिक रास्ता चुना। अब उसी सर्वे में उनके पूर्व राजनीतिक बॉस से थोड़ा अधिक समर्थन मिलना उनके समर्थकों के लिए निश्चित तौर पर चर्चा का विषय बन सकता है।
दूसरी तरफ, अरविंद केजरीवाल भारतीय राजनीति में एक स्थापित नाम हैं। ऐसे में केवल 0.1 प्रतिशत अंक के अंतर को किसी बड़े राजनीतिक उलटफेर के रूप में देखना सही नहीं होगा। सर्वे के आंकड़ों की अपनी सीमाएं होती हैं और समय के साथ लोगों की पसंद भी बदल सकती है।
लेकिन राजनीति में प्रतीकात्मक आंकड़ों की भी अपनी अहमियत होती है। अभिजीत दिपके का 1.3 प्रतिशत समर्थन हासिल करना यह दिखाता है कि उनका नाम कम से कम एक छोटे हिस्से के बीच प्रधानमंत्री पद की पसंद के तौर पर सामने आया है। CJP के लिए यह आंकड़ा संगठन की पहचान बढ़ाने और अपने राजनीतिक संदेश को आगे ले जाने में मददगार हो सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अभिजीत दिपके और CJP आने वाले समय में अपनी इस पहचान को वास्तविक राजनीतिक समर्थन में बदल पाएंगे। क्या युवाओं के मुद्दों पर उनका फोकस उन्हें बड़े राजनीतिक मंच तक पहुंचा पाएगा, या यह सिर्फ एक सर्वे का छोटा-सा आंकड़ा बनकर रह जाएगा?
फिलहाल MOTN सर्वे का यह आंकड़ा राजनीतिक चर्चाओं के लिए जरूर नया मसाला लेकर आया है। 1.3 प्रतिशत समर्थन के साथ अभिजीत दिपके ने 1.2 प्रतिशत वाले अरविंद केजरीवाल को मामूली अंतर से पीछे छोड़ा है। अंतर सिर्फ 0.1 प्रतिशत अंक का है, लेकिन दिपके के तेजी से बदलते राजनीतिक सफर को देखते हुए यह आंकड़ा आने वाले दिनों में CJP और उसके नेतृत्व को लेकर चर्चा बढ़ा सकता है।


