जॉर्डन को ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष की कीमत चुकानी पड़ रही है। देश में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी के कारण ईरान की ओर से जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को कई बार निशाना बनाया जा चुका है। इसके बावजूद जॉर्डन ने साफ संकेत दिया है कि वह अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक और रक्षा साझेदारी को जारी रखेगा। जॉर्डन के लिए यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है और ईरान की ओर से मिसाइल तथा ड्रोन हमलों का खतरा बना हुआ है। अमेरिकी सैनिकों की मेजबानी करने वाले जॉर्डन को एक तरफ अपने पुराने सहयोगी अमेरिका के साथ खड़ा रहना है, तो दूसरी तरफ ईरान के हमलों से अपने नागरिकों और सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी है।
विश्लेषकों का कहना है कि ईरान की ओर से किए गए सैकड़ों ड्रोन और मिसाइल हमलों ने जॉर्डन पर पहले से मौजूद दबाव को और बढ़ा दिया है। जॉर्डन की अर्थव्यवस्था पहले ही सुस्त दौर से गुजर रही है और उसके आसपास के इलाकों में भी अस्थिरता बढ़ रही है। पड़ोसी वेस्ट बैंक में बढ़ते तनाव और इजराइल-फलस्तीन संघर्ष ने भी जॉर्डन के सामने सुरक्षा और राजनीतिक चुनौतियां बढ़ा दी हैं। ऐसे हालात में ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष का जॉर्डन की जमीन तक पहुंचना उसके लिए गंभीर चिंता का विषय है।
इसके बावजूद अम्मान अमेरिका के साथ अपने संबंधों को कमजोर करने के पक्ष में नहीं दिखाई दे रहा है। जॉर्डन पिछले कई दशकों से अमेरिका के साथ सुरक्षा और रक्षा सहयोग मजबूत करता आया है। उसका उद्देश्य पश्चिम एशिया जैसे संवेदनशील क्षेत्र में खुद को पश्चिमी देशों के एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में स्थापित करना रहा है। जॉर्डन के नेताओं का मानना है कि अमेरिका के साथ मजबूत सुरक्षा साझेदारी देश को क्षेत्रीय खतरों से निपटने में महत्वपूर्ण मदद देती है। खासतौर पर ईरान की ओर से क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने और पड़ोसी देशों को अस्थिर करने की कोशिशों के बीच अमेरिकी सहयोग को जॉर्डन अपनी सुरक्षा के लिए अहम मानता है।
जॉर्डन के शाह अब्दुल्ला द्वितीय भी क्षेत्रीय गठजोड़ की जरूरत पर जोर दे चुके हैं। उन्होंने पिछले साल कहा था कि कोविड-19 संकट, यूक्रेन पर रूस के व्यापक हमले और पश्चिम एशिया में इजराइल के कई सैन्य अभियानों से पैदा हुई अस्थिरता केवल इसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि इसका असर काफी दूर तक महसूस किया जा सकता है। ऐसे में जॉर्डन के लिए अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के साथ सुरक्षा संबंध बनाए रखना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।
अमेरिका और जॉर्डन के बीच रक्षा सहयोग को 2021 में हुए समझौते से भी मजबूती मिली। इस समझौते के तहत अमेरिकी बलों को जॉर्डन में 12 सैन्य प्रतिष्ठानों तक पहुंच प्रदान की गई है। इन सैन्य सुविधाओं की मौजूदगी जॉर्डन को क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में महत्वपूर्ण भूमिका देती है, लेकिन इसके साथ ही देश ईरान और उसके सहयोगी समूहों के निशाने पर आने के खतरे का सामना भी कर रहा है। ईरान की ओर से जॉर्डन में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी वाले स्थानों को निशाना बनाकर कई हमले किए जा चुके हैं।
हालांकि जॉर्डन की सुरक्षा व्यवस्था और अमेरिकी वायु रक्षा प्रणालियों ने अब तक कई हमलों को नाकाम किया है। ज्यादातर मिसाइलों और ड्रोन को उनके लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही नष्ट कर दिया गया। इसके बावजूद लगातार हमलों की आशंका ने जॉर्डन की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। जॉर्डन के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अमेरिका के साथ अपनी साझेदारी को बनाए रखते हुए खुद को ईरान-अमेरिका संघर्ष की सीधी मार से कैसे बचाए।
इस बीच नाटो ने भी 2025 में क्षेत्र में अपना पहला संपर्क कार्यालय जॉर्डन में खोला था, जिससे पश्चिमी सुरक्षा ढांचे में जॉर्डन की अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। मौजूदा परिस्थितियों में जॉर्डन एक बेहद नाजुक संतुलन साध रहा है। एक तरफ अमेरिका के साथ उसकी दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी है, तो दूसरी तरफ ईरान के हमलों से बढ़ता सुरक्षा खतरा। ऐसे में आने वाले दिनों में जॉर्डन की भूमिका पश्चिम एशिया के बदलते समीकरणों में और भी महत्वपूर्ण हो सकती है।


