महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर बनाई गई समिति में मतभेद सामने आए हैं। समिति के सदस्य और सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस आरसी चव्हाण ने समिति के काम करने के तरीके पर असहमति जताते हुए इस्तीफा दे दिया है। उनके इस्तीफे के बाद समिति की कार्यप्रणाली और यूसीसी को लेकर अपनाई जा रही प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं।
जस्टिस आरसी चव्हाण ने समिति की बैठक के बाद अपना इस्तीफा दिया। उन्होंने समिति की ओर से तैयार की गई प्रश्नावली को लेकर आपत्ति दर्ज कराई। उनका कहना है कि यूसीसी जैसे महत्वपूर्ण विषय पर लोगों की राय जानने की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिससे अलग-अलग विचारों को सामने लाया जा सके और व्यापक सहमति बनाने की दिशा में काम किया जा सके।
महाराष्ट्र सरकार ने समान नागरिक संहिता को लेकर इसी साल जुलाई में सात सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना देसाई कर रही हैं। समिति को महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता लागू करने से जुड़े नियमों और सिफारिशों का मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है।
समिति का काम राज्य में अलग-अलग समुदायों और वर्गों से जुड़े व्यक्तिगत कानूनों से संबंधित विषयों का अध्ययन करना और समान नागरिक संहिता के संभावित स्वरूप पर सुझाव देना है। इसी प्रक्रिया के तहत लोगों से राय लेने और विभिन्न मुद्दों पर प्रतिक्रिया जुटाने के लिए प्रश्नावली तैयार की गई थी।
जस्टिस आरसी चव्हाण ने इसी प्रश्नावली को लेकर अपनी असहमति जाहिर की। उनका मानना है कि लोगों से राय लेने की प्रक्रिया का उद्देश्य केवल जवाब हासिल करना नहीं होना चाहिए, बल्कि अलग-अलग विचारों को समझना और उनके बीच सहमति बनाने की दिशा में आगे बढ़ना होना चाहिए।
उनके इस्तीफे के बाद अब समिति की कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि समिति के बाकी सदस्यों और महाराष्ट्र सरकार की ओर से इस मतभेद को लेकर क्या रुख अपनाया जाता है, यह आगे स्पष्ट होगा।
समान नागरिक संहिता का विषय देश में लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। इसके तहत अलग-अलग धार्मिक और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े मामलों में एक समान कानूनी व्यवस्था की बात की जाती है। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे विषय यूसीसी की चर्चा के प्रमुख हिस्से रहे हैं।
महाराष्ट्र में समिति का गठन इसी व्यापक विषय पर राज्य स्तर पर नियम और सिफारिशें तैयार करने के उद्देश्य से किया गया है। समिति को विभिन्न पक्षों की राय और संबंधित कानूनी पहलुओं का अध्ययन करके आगे की प्रक्रिया के लिए सुझाव देने हैं।
जस्टिस आरसी चव्हाण के इस्तीफे ने समिति के भीतर मौजूद मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया है। खास तौर पर प्रश्नावली को लेकर उनकी आपत्ति अब चर्चा का केंद्र बन गई है। उन्होंने जिस तरह लोगों की राय और व्यापक सहमति की आवश्यकता पर जोर दिया है, उससे समिति के आगे के कामकाज को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
अब समिति के सामने आगे की प्रक्रिया को जारी रखने की जिम्मेदारी है। समिति प्रश्नावली और लोगों से राय लेने की प्रक्रिया को किस तरह आगे बढ़ाती है और जस्टिस चव्हाण के इस्तीफे के बाद उसकी कार्यप्रणाली में कोई बदलाव होता है या नहीं, इस पर नजर रहेगी।


