अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अरबपति कारोबारी एलन मस्क से जुड़े हालिया घटनाक्रमों ने भारत की विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यापारिक रिश्तों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ अमेरिका भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर दबाव बनाता रहा है, तो दूसरी तरफ अब खुद अमेरिका द्वारा रूस से डीजल खरीदने की घोषणा ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं, एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक को भारत में अपनी सेवाएं शुरू करने के लिए सुरक्षा संबंधी मंजूरियों और नियामकीय प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ रहा है। इन घटनाओं के बीच चर्चा हो रही है कि क्या भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देकर अमेरिका जैसी महाशक्ति के सामने अपनी मजबूत स्थिति बनाए हुए है?
सबसे पहले बात एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक की। भारत में उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवाएं शुरू करने के लिए कंपनी को सरकारी नियमों और सुरक्षा संबंधी शर्तों का पालन करना होगा। स्टारलिंक को लेकर हाल के दिनों में विवाद भी सामने आया है। एलन मस्क ने आरोप लगाया कि कुछ कारोबारी हित भारत में उनकी कंपनी के प्रवेश में बाधा डाल रहे हैं। हालांकि, भारत सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उपग्रह इंटरनेट सेवाएं देने वाली सभी कंपनियों को समान नियमों का पालन करना होगा। स्टारलिंक के साथ जियो और एयरटेल से जुड़ी उपग्रह संचार सेवाओं को भी नियामकीय और सुरक्षा संबंधी आवश्यकताएं पूरी करनी हैं। ऐसे में इस मामले को केवल मस्क और मोदी सरकार के बीच टकराव के रूप में देखना सही नहीं होगा।
भारत के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा और दूरसंचार व्यवस्था की निगरानी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। किसी विदेशी कंपनी को देश में इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध कराने की अनुमति देने से पहले उसके तकनीकी ढांचे, सुरक्षा व्यवस्था और नियामकीय अनुपालन की जांच की जाती है। स्टारलिंक को भी इन्हीं प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ रहा है। भारत सरकार का रुख यह है कि किसी कंपनी को केवल उसकी वैश्विक लोकप्रियता या आर्थिक ताकत के आधार पर नियमों में छूट नहीं दी जा सकती। इस मामले में अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनी सभी निर्धारित शर्तें कब और किस तरह पूरी करती है।
अब बात उस घटनाक्रम की, जिसने अमेरिका की रूस नीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत के बाद रूस से डीजल की बड़ी खेप मिलने की घोषणा की है। सामने आई जानकारी के अनुसार, रूस तत्काल 3 लाख टन से अधिक डीजल उपलब्ध कराने के साथ आगे भी आपूर्ति करने की योजना में है। इस फैसले के लिए अमेरिकी प्रशासन ने रूसी डीजल के आयात से जुड़ी प्रतिबंधों में अस्थायी छूट देने की व्यवस्था भी की है। यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिका पहले रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाने की नीति अपनाता रहा है।
भारत भी रूस से कच्चा तेल खरीदने के कारण अमेरिकी दबाव और अतिरिक्त शुल्कों की चर्चा के केंद्र में रहा है। भारत का तर्क रहा है कि ऊर्जा सुरक्षा और देश की जरूरतों के अनुसार तेल खरीदना उसके राष्ट्रीय हितों से जुड़ा विषय है। अब जब अमेरिका खुद रूस से डीजल खरीदने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो उसकी नीति की निरंतरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, कच्चे तेल और तैयार डीजल के व्यापार में अंतर है और दोनों सौदों की परिस्थितियां भी अलग हो सकती हैं। इसलिए इन दोनों मामलों की तुलना करते समय आर्थिक जरूरतों, प्रतिबंधों और संबंधित समझौतों की शर्तों को ध्यान में रखना जरूरी है।
इसी बीच रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की अमेरिकी व्यवस्था भी चर्चा में है। अमेरिकी कानून राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर कुछ परिस्थितियों में 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का अधिकार देता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत पर अपने आप 100 प्रतिशत टैरिफ लग गया है। ऐसा कोई कदम उठाने का वास्तविक प्रभाव संबंधित सरकारी फैसलों और लागू की जाने वाली शर्तों पर निर्भर करेगा। भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंधों पर इसका क्या असर पड़ेगा, यह भी आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने की नीति अपनाई है। रूस के साथ ऊर्जा संबंध, अमेरिका के साथ व्यापार और पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक सहयोग भारत की विदेश नीति के अलग-अलग हिस्से हैं। भारत के सामने चुनौती इन संबंधों में संतुलन बनाए रखने की है, ताकि ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार, तकनीक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हित सुरक्षित रह सकें। किसी एक घटनाक्रम को भारत की निर्णायक जीत या अमेरिका की पूरी तरह विफलता बताने के बजाय उसके वास्तविक आर्थिक और कूटनीतिक परिणामों का आकलन करना अधिक उचित होगा।
फिलहाल स्टारलिंक की मंजूरियों और रूस से अमेरिकी डीजल सौदे ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दो महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। क्या अमेरिका भारत पर रूस से ऊर्जा खरीदने के मामले में एक समान नीति अपनाएगा? और क्या भारत विदेशी तकनीकी कंपनियों के साथ संबंधों में सुरक्षा संबंधी शर्तों पर बिना समझौता किए आगे बढ़ पाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में सामने आएंगे। इतना स्पष्ट है कि वैश्विक राजनीति में आर्थिक हित, ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय संप्रभुता एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। भारत की वास्तविक ताकत का आकलन भी इन्हीं क्षेत्रों में मिलने वाले ठोस परिणामों से किया जाना चाहिए।


