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US-Iran Tensions: होर्मुज जलडमरूमध्य के पास अमेरिकी हमला, ईरान के सैन्य ठिकाने तबाह, बढ़ा युद्ध का खतरा

मध्य पूर्व में शांति की कोशिशों के बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी सेना ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास स्थित ईरान के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण गोरुक और केशम द्वीप पर सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। इस कार्रवाई के बाद क्षेत्र में युद्ध की आशंकाएं फिर तेज हो गई हैं।

अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, यह कार्रवाई ईरान की ओर से भेजे गए चार “वन-वे अटैक ड्रोन” के जवाब में की गई। अमेरिकी सेना का दावा है कि ये ड्रोन क्षेत्रीय समुद्री यातायात और सुरक्षा के लिए तत्काल खतरा पैदा कर रहे थे।

CENTCOM ने बताया कि संभावित हमलों को रोकने और अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए गोरुक और केशम द्वीप पर मौजूद ईरानी तटीय निगरानी रडार साइटों को निशाना बनाया गया। अमेरिका का कहना है कि उसकी यह कार्रवाई पूरी तरह आत्मरक्षा के तहत की गई है।

गौरतलब है कि केशम द्वीप फारस की खाड़ी का सबसे बड़ा द्वीप है और होर्मुज जलडमरूमध्य के बेहद करीब स्थित है। यह वही समुद्री मार्ग है जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस व्यापार गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव वैश्विक बाजारों और ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान ने गोरुक और केशम क्षेत्र में नौसैनिक संसाधन, ड्रोन नेटवर्क और एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम तैनात कर रखे हैं। अमेरिका लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि इन सैन्य सुविधाओं का इस्तेमाल फारस की खाड़ी में जहाजों को निशाना बनाने और समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया घटनाक्रम से अमेरिका और ईरान के बीच चल रही कूटनीतिक कोशिशों को झटका लग सकता है। इससे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने और शांति वार्ताओं पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्थिति को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा कि ईरान के साथ बातचीत सही दिशा में बढ़ रही है और जल्द ही इस मुद्दे का समाधान निकल सकता है। ट्रंप ने यह भी कहा कि समझौते और कड़े कदम दोनों विकल्प अमेरिका के सामने मौजूद हैं।

फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें मध्य पूर्व पर टिकी हुई हैं। यदि तनाव और बढ़ता है तो इसका असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार, तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।

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