क्या अब देश की हर गृहिणी को हर महीने 30 हजार रुपये मिलेंगे? सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं के बीच इस सवाल का जवाब जानना बेहद जरूरी है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, लेकिन इस फैसले का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सभी हाउसवाइफ को सरकार या किसी संस्था की ओर से 30 हजार रुपये प्रतिमाह दिए जाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने एक सड़क दुर्घटना से जुड़े मुआवजा मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि गृहिणियों के घरेलू कार्यों का आर्थिक मूल्य शून्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि मोटर दुर्घटना में किसी गृहिणी की मृत्यु या गंभीर रूप से अक्षम होने की स्थिति में मुआवजा तय करते समय उसके घरेलू योगदान को भी आर्थिक मूल्य दिया जाएगा।
यह मामला हरियाणा के फतेहाबाद में वर्ष 2001 में हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा था। दुर्घटना में एक महिला की मौत हो गई थी। शुरुआती स्तर पर परिवार को केवल 2 लाख रुपये का मुआवजा मिला क्योंकि महिला के घरेलू कार्यों को आय के रूप में नहीं माना गया था।
बाद में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मुआवजा बढ़ाकर 8 लाख 43 हजार रुपये किया। लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने महिला के घरेलू योगदान को ध्यान में रखते हुए कुल मुआवजा बढ़ाकर 62 लाख 77 हजार 900 रुपये निर्धारित कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुआवजा तय करने के लिए गृहिणी की न्यूनतम मासिक आय 30 हजार रुपये मानी जा सकती है। इसी आधार पर भविष्य की आय, पारिवारिक निर्भरता और अन्य कानूनी मानकों को जोड़कर अंतिम मुआवजा तय किया जाएगा।
अदालत ने यह भी माना कि घरेलू कामकाज करने वाली महिलाएं राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनके श्रम का आर्थिक मूल्य है और उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया कि भारत में महिलाएं प्रतिदिन कई घंटे अवैतनिक घरेलू कार्य करती हैं और उनके योगदान का असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। अदालत ने कहा कि ऐसे योगदान को कानूनी और सामाजिक मान्यता मिलनी चाहिए।
हालांकि यह फैसला केवल मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों से जुड़ा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी गृहिणियों को हर महीने 30 हजार रुपये की नियमित राशि मिलेगी।
यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पहली बार घरेलू कामकाज को आर्थिक मूल्य देकर मुआवजा निर्धारण का स्पष्ट आधार तय किया गया है। इससे भविष्य में ऐसे मामलों में पीड़ित परिवारों को अधिक न्यायसंगत मुआवजा मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।


