पश्चिम एशिया में लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बीच एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका और ईरान के बीच हुए कथित शांति समझौते पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी प्रतिक्रिया दी है और इस पहल का स्वागत किया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए कहा कि भारत पश्चिम एशिया में शांति, स्थिरता और संवाद आधारित समाधान का हमेशा समर्थन करता रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि कई दिनों की गहन बातचीत के बाद बना यह समझौता समुद्री मार्गों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुचारू बनाने में मदद करेगा।
प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने का उल्लेख किया। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है।
उन्होंने कहा कि भारत बाकी बचे मुद्दों पर भी बातचीत के जरिए एक स्थायी और व्यापक समाधान की उम्मीद करता है।
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस समझौते को ऐतिहासिक बताते हुए दावा किया कि इससे पूरे पश्चिम एशिया में शांति और सुरक्षा स्थापित होगी।
ट्रंप ने कहा कि कई अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान के साथ शांति स्थापित करने की कोशिश कर चुके थे, लेकिन उनकी सरकार ऐसा परिणाम हासिल करने में सफल रही है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोल दिया जाएगा और क्षेत्र में तेल की आपूर्ति सामान्य हो जाएगी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई और कई दौर की बातचीत के बाद यह सहमति बनी।
दूसरी ओर, ईरान के कानूनी और अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप-विदेश मंत्री काज़ेम ग़रीबाबादी ने भी समझौते की पुष्टि करते हुए कुछ महत्वपूर्ण शर्तों का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि ईरान प्रस्तावित 60 दिनों की वार्ता प्रक्रिया में तभी शामिल होगा, जब अमेरिका अपने वादों को पूरी तरह लागू करेगा। इनमें दुश्मनी समाप्त करना, आर्थिक नाकेबंदी हटाना और ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को जारी करना शामिल है।
ईरानी अधिकारियों का कहना है कि यह समझौता लंबे कूटनीतिक प्रयासों और क्षेत्रीय परिस्थितियों का परिणाम है।
हालांकि एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अभी तक अमेरिका और ईरान के बीच कथित समझौते का पूरा आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसलिए विशेषज्ञ इसे अंतिम शांति समझौते के बजाय एक प्रारंभिक या अंतरिम ढांचा मान रहे हैं।
भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयातित तेल पर निर्भर है। होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और ईंधन कीमतों पर पड़ सकता है।
यदि यह समझौता सफल रहता है, तो इससे वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता आ सकती है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी राहत मिल सकती है।
अब पूरी दुनिया की नजर आने वाले दिनों पर टिकी हुई है, जब इस समझौते के औपचारिक हस्ताक्षर और आगे की वार्ता प्रक्रिया पूरी होगी।
नोट: अभी तक समझौते का पूरा आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं हुआ है। इसलिए इससे जुड़ी जानकारी को उपलब्ध सरकारी बयानों और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर ही देखा जाना चाहिए।


