यूक्रेन युद्ध के बीच अब यूरोप की सुरक्षा को लेकर एक नई चिंता सामने आई है। ब्रिटिश अखबार द गार्डियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, NATO की पूर्वी सीमा पर स्थित देशों ने आशंका जताई है कि रूस आने वाले समय में बाल्टिक देशों या पोलैंड के खिलाफ किसी सीमित सैन्य या हाइब्रिड कार्रवाई की कोशिश कर सकता है। हालांकि फिलहाल ऐसी किसी कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस संभावना ने पश्चिमी देशों की चिंता बढ़ा दी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि रूस सीधे NATO से बड़े युद्ध में उतरने के बजाय उसकी एकजुटता और सैन्य प्रतिक्रिया की क्षमता को परखना चाहता है। आशंका जताई जा रही है कि यदि किसी सदस्य देश पर सीमित हमला या साइबर, ड्रोन अथवा अन्य हाइब्रिड कार्रवाई होती है, तो NATO का आर्टिकल-5 कितनी तेजी और मजबूती से लागू होता है, यह रूस के लिए महत्वपूर्ण परीक्षण हो सकता है।
22 जून को लातविया के खुफिया अधिकारियों ने भी संकेत दिए थे कि रूस बाल्टिक देशों या पोलैंड के खिलाफ किसी प्रकार की सैन्य उकसावे वाली गतिविधि की तैयारी कर सकता है। अधिकारियों के अनुसार यह पारंपरिक युद्ध नहीं होगा, बल्कि मिसाइल, ड्रोन, साइबर हमले या अन्य अप्रत्यक्ष तरीकों से दबाव बनाने की कोशिश हो सकती है। इसका उद्देश्य यूक्रेन को मिलने वाले पश्चिमी समर्थन को कमजोर करना भी हो सकता है।
खुफिया एजेंसियों का मानना है कि सबसे बड़ी चिंता रूस की सैन्य क्षमता से ज्यादा निर्णय प्रक्रिया को लेकर है। उनका कहना है कि यदि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को वास्तविक स्थिति की बजाय केवल सकारात्मक जानकारी ही मिलती रही, तो गलत आकलन की संभावना बढ़ सकती है, जिससे क्षेत्रीय तनाव और अधिक गंभीर रूप ले सकता है।
भौगोलिक दृष्टि से बाल्टिक देशों की स्थिति बेहद संवेदनशील मानी जाती है। एस्टोनिया की लंबी सीमा सीधे रूस से लगती है, जबकि लातविया और लिथुआनिया की सीमाएं रूस के साथ-साथ बेलारूस से भी जुड़ी हैं। यही कारण है कि इन देशों को अपनी सुरक्षा को लेकर लगातार सतर्क रहना पड़ता है।
पोलैंड की स्थिति भी रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। उसके उत्तर में रूस का कालिनिनग्राद क्षेत्र स्थित है, जबकि पूर्व में बेलारूस है। कालिनिनग्राद रूस का एक अलग भूभाग है, जहां उसकी नौसैनिक और मिसाइल क्षमताएं मजबूत मानी जाती हैं। भविष्य में किसी बड़े संघर्ष की स्थिति में यह इलाका महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
विशेषज्ञों की नजर सबसे ज्यादा सुवालकी गैप पर है। लगभग 65 किलोमीटर चौड़ी यह भूमि पट्टी पोलैंड और लिथुआनिया को जोड़ती है और यही बाल्टिक देशों का यूरोप तथा NATO से एकमात्र जमीनी संपर्क है। यदि किसी संघर्ष के दौरान इस क्षेत्र में बाधा उत्पन्न होती है, तो बाल्टिक देशों तक सैन्य सहायता पहुंचाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
NATO के ईस्टर्न फ्लैंक में वे सदस्य देश शामिल हैं जो रूस या उसके सहयोगी बेलारूस के सबसे करीब स्थित हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद इन देशों ने अपनी सीमाओं पर सुरक्षा बढ़ा दी है और NATO ने भी अतिरिक्त सैनिकों तथा सैन्य संसाधनों की तैनाती की है। इसका उद्देश्य संभावित खतरे की स्थिति में सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
रूस पर लंबे समय से तथाकथित ग्रे ज़ोन टैक्टिक्स अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। इसमें सीधे युद्ध की बजाय साइबर हमले, दुष्प्रचार, सीमा पर तनाव, ड्रोन गतिविधियां और अन्य अप्रत्यक्ष उपायों के जरिए दबाव बनाने की रणनीति शामिल होती है। हालांकि प्रत्येक घटना के पीछे रूस की भूमिका को लेकर अलग-अलग मामलों में स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक होती है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि रूस वास्तव में किसी NATO सदस्य देश के खिलाफ कार्रवाई करेगा या नहीं। लेकिन यूरोप की सुरक्षा एजेंसियां और NATO सदस्य देश इस संभावना को गंभीरता से लेते हुए अपनी तैयारियां मजबूत कर रहे हैं। आने वाले समय में इस क्षेत्र की घटनाएं वैश्विक सुरक्षा और भू-राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।


