सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह (Polygamy) की प्रथा को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। शुक्रवार को प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। अदालत ने इस याचिका को पहले से लंबित समान मामलों के साथ जोड़ते हुए आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
यह जनहित याचिका महिला अधिकार कार्यकर्ताओं जकिया सोमन, नूरजहां सफिया नियाज और अन्य की ओर से दायर की गई है। याचिका में मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह की प्रथा को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन बताते हुए इसे असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से अनुरोध किया है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82 को सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू करने का निर्देश दिया जाए। उनका कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बहुविवाह को मिलने वाली छूट के कारण मुस्लिम महिलाओं को वह कानूनी सुरक्षा नहीं मिल पाती, जो अन्य समुदायों की महिलाओं को दूसरी शादी के मामलों में उपलब्ध है।
याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अधिनियम, 1937 की धारा 2 की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रावधान बहुविवाह को वैधता देता है, जिससे कानून के समक्ष समानता का सिद्धांत प्रभावित होता है। उनका कहना है कि सभी नागरिकों के लिए विवाह से जुड़े कानून समान रूप से लागू होने चाहिए।
इसके अलावा याचिका में मुस्लिम विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण सुनिश्चित करने की मांग भी की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे गुप्त या बिना रिकॉर्ड वाली शादियों पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। साथ ही पहली पत्नी और बच्चों के लिए ससुराल में रहने के अधिकार, बहुविवाह से जुड़े मामलों में त्वरित गुजारा-भत्ता और महिलाओं के कानूनी संरक्षण को मजबूत करने की भी मांग की गई है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि बहुविवाह इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है, बल्कि कुछ परिस्थितियों में दी गई एक अनुमति है, जिसे न्याय और समान व्यवहार जैसी शर्तों के साथ जोड़ा गया है। याचिकाकर्ताओं ने अपने पक्ष के समर्थन में कुछ मुस्लिम-बहुल देशों का भी उल्लेख किया है, जहां कानून के माध्यम से बहुविवाह पर रोक लगाई जा चुकी है।
साथ ही याचिका में संविधान के अनुच्छेद 44 का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के तहत समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लागू करने की बात कही गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि विवाह संबंधी कानूनों में समानता और लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए इस दिशा में कदम उठाए जाने चाहिए।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है। अदालत ने केवल केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और याचिका को लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया है। अब इस मामले में केंद्र सरकार के जवाब और आगामी सुनवाई के बाद ही आगे की कानूनी प्रक्रिया और अदालत का रुख स्पष्ट होगा।


