अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और इजरायल, ईरान तथा मध्य पूर्व के अन्य देशों की अपील पर ईरान के खिलाफ प्रस्तावित नए हमलों को फिलहाल टालने के लिए तैयार हो गए हैं। ट्रंप के अनुसार, सभी पक्ष युद्ध को समाप्त करने की दिशा में एक नए समझौते की शर्तों पर सहमति बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हुई है और संबंधित पक्षों की ओर से आधिकारिक संयुक्त घोषणा भी सामने नहीं आई है।
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर पोस्ट साझा करते हुए कहा कि प्रस्तावित समझौते के तहत होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने पर सहमति बनने की दिशा में बातचीत हुई है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और इसकी स्थिति का असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।
ट्रंप का कहना है कि अमेरिकी सेना ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार थी, लेकिन कूटनीतिक प्रयासों और क्षेत्रीय देशों की अपील के बाद हमलों को रोकने का फैसला किया गया। उनके अनुसार, यदि समझौता अंतिम रूप ले लेता है तो भविष्य में सैन्य कार्रवाई की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। हालांकि, इस संबंध में अमेरिकी प्रशासन या अन्य संबंधित देशों की ओर से विस्तृत आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है।
ट्रंप ने यह भी दावा किया कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाला इजरायल भी इस संभावित समझौते का समर्थन कर रहा है। हालांकि, इजरायल सरकार की ओर से इस कथित समझौते पर कोई आधिकारिक पुष्टि सार्वजनिक रूप से नहीं की गई है।
हाल के महीनों में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच तनाव कई बार बढ़ा है। क्षेत्रीय सुरक्षा, परमाणु कार्यक्रम और समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर लगातार बयानबाजी और सैन्य गतिविधियां देखने को मिली हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी नए समझौते पर सहमति बनती है, तो इससे मध्य पूर्व में तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
गौरतलब है कि सोशल मीडिया पोस्ट या राजनीतिक नेताओं के दावों और वास्तविक कूटनीतिक समझौतों के बीच अंतर हो सकता है। ऐसे मामलों में अंतिम स्थिति संबंधित सरकारों की आधिकारिक घोषणाओं और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की पुष्टि के बाद ही स्पष्ट होती है।
फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बातचीत किसी औपचारिक समझौते तक पहुंचती है या नहीं। यदि ऐसा होता है, तो इसका असर केवल क्षेत्रीय सुरक्षा ही नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है।


