सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए नए रक्षा समझौते ने पश्चिम एशिया की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। मक्का में हुए इस समझौते के बाद तीनों देशों के बीच सैन्य सहयोग को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। समझौते में सामूहिक रक्षा का प्रावधान शामिल है, जिसके तहत किसी एक देश पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति को तीनों देशों के खिलाफ हमला माना जाएगा।
इस समझौते के सामने आते ही ईरान की ओर से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। वहीं भारत के रणनीतिक विशेषज्ञ भी इस नए समीकरण पर नजर बनाए हुए हैं।
ईरान ने समझौते पर उठाए सवाल
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच रक्षा समझौते की खबर सामने आने के बाद ईरानी सांसद इब्राहिम रजई ने इसकी आलोचना की। उन्होंने इस समझौते को कागजी करार बताते हुए सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए।
ईरानी पक्ष का तर्क है कि सिर्फ किसी दूसरे देश के साथ रक्षा समझौता कर लेने से किसी देश की सुरक्षा पूरी तरह सुनिश्चित नहीं हो जाती। ईरान की ओर से यह भी कहा गया कि सऊदी अरब पहले से ही अमेरिका के साथ मजबूत सुरक्षा संबंध रखता रहा है, इसके बावजूद क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियां बनी हुई हैं।
क्या है मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट?
इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण बात इसका सामूहिक रक्षा प्रावधान है। इसके तहत तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा।
इसी प्रावधान की वजह से इसकी तुलना NATO की सामूहिक रक्षा व्यवस्था से की जा रही है। हालांकि, इसे सीधे तौर पर ‘इस्लामिक NATO’ कहना अभी राजनीतिक विश्लेषण है। समझौते का वास्तविक प्रभाव आने वाले समय में तीनों देशों के बीच सैन्य सहयोग और संयुक्त गतिविधियों से स्पष्ट होगा।
पाकिस्तान और तुर्की पर सऊदी का भरोसा
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच सैन्य संबंध काफी पुराने हैं। पाकिस्तान की बड़ी सैन्य क्षमता और परमाणु शक्ति को देखते हुए दोनों देशों के रक्षा संबंधों को रणनीतिक महत्व दिया जाता है।
वहीं तुर्की पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन और रक्षा तकनीक के क्षेत्र में तेजी से उभरा है। तुर्की के Bayraktar जैसे ड्रोन दुनिया के कई देशों में चर्चा का विषय रहे हैं। रक्षा उत्पादन में उसकी बढ़ती क्षमता सऊदी अरब के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
ऐसे में इस समझौते में पाकिस्तान की सैन्य ताकत और तुर्की की रक्षा तकनीक को सऊदी अरब की आर्थिक क्षमता के साथ जोड़कर देखा जा रहा है।
क्या पाकिस्तान देगा सऊदी को परमाणु सुरक्षा?
समझौते के बाद पाकिस्तान की परमाणु ताकत को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस समझौते के तहत पाकिस्तान ने सऊदी अरब को परमाणु सुरक्षा की औपचारिक गारंटी दे दी है।
सामूहिक रक्षा समझौते में किसी एक सदस्य पर हमले की स्थिति में सहयोग की बात जरूर है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि पाकिस्तान किसी संभावित संघर्ष में अपने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल सऊदी अरब की रक्षा के लिए करेगा।
इसलिए ‘न्यूक्लियर छाते’ की चर्चा को फिलहाल रणनीतिक अटकल के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा।
भारत के लिए क्यों अहम है यह समझौता?
इस पूरे घटनाक्रम पर भारत की नजर होना स्वाभाविक है। पाकिस्तान भारत का पड़ोसी देश है और दोनों के बीच लंबे समय से रणनीतिक तनाव रहा है। दूसरी ओर तुर्की ने कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर पाकिस्तान का समर्थन किया है।
अगर नए रक्षा समझौते के बाद पाकिस्तान और तुर्की के बीच सैन्य तकनीक, प्रशिक्षण और रक्षा सहयोग और मजबूत होता है, तो भारत के लिए यह निश्चित रूप से रणनीतिक महत्व का विषय होगा।
हालांकि, भारत और सऊदी अरब के रिश्ते भी पिछले वर्षों में काफी मजबूत हुए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा, निवेश और रणनीतिक सहयोग लगातार बढ़ा है। इसलिए इस समझौते को सीधे तौर पर भारत विरोधी गठबंधन कहना अभी उचित नहीं होगा।
पश्चिम एशिया में बदल सकता है समीकरण
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया पहले से ही तनावपूर्ण दौर से गुजर रहा है। ईरान और उसके क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों के बीच सुरक्षा समीकरण लगातार बदल रहे हैं।
ऐसे में तीन देशों का संयुक्त रक्षा ढांचा क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, इस समझौते की वास्तविक ताकत इस बात से तय होगी कि आने वाले समय में तीनों देश कितनी गंभीरता से सैन्य सहयोग, संयुक्त अभ्यास और सुरक्षा समन्वय को आगे बढ़ाते हैं।
फिलहाल ईरान की तीखी प्रतिक्रिया ने यह साफ कर दिया है कि तेहरान इस नए समीकरण को नजरअंदाज करने के मूड में नहीं है। अब आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सऊदी-पाकिस्तान-तुर्की की यह साझेदारी सिर्फ कागजों तक सीमित रहती है या पश्चिम एशिया में एक नई रणनीतिक ताकत के रूप में उभरती है।


