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ईरान ने पलटा पूरा गेम! BRICS के सहारे अमेरिका की आर्थिक घेराबंदी को चुनौती देने की तैयारी

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कोई नया नहीं है, लेकिन अब इस संघर्ष का एक नया मोर्चा खुलता दिखाई दे रहा है और वह है आर्थिक ताकत का मुकाबला। अमेरिका लंबे समय से ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उसकी तेल आय, बैंकिंग व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कारोबार को प्रभावित करने की कोशिश करता रहा है। ट्रंप प्रशासन की रणनीति भी ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की रही है। अमेरिका का उद्देश्य साफ है कि ईरान की अर्थव्यवस्था पर इतना दबाव बनाया जाए कि तेहरान अपनी नीतियों में बदलाव करने के लिए मजबूर हो। लेकिन ईरान ने भी इस दबाव से निपटने के लिए वैकल्पिक रास्तों की तलाश तेज कर दी है। यही वजह है कि अब BRICS और गैर-पश्चिमी देशों के साथ ईरान की बढ़ती आर्थिक नजदीकी को काफी अहम माना जा रहा है। ईरान पहले ही BRICS समूह का सदस्य बन चुका है और अब वह संगठन के आर्थिक और वित्तीय तंत्र का इस्तेमाल अपने अंतरराष्ट्रीय कारोबार को मजबूत करने के लिए करना चाहता है। ईरान की रणनीति यह है कि पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था और अमेरिकी डॉलर पर उसकी निर्भरता को धीरे-धीरे कम किया जाए और चीन, रूस तथा अन्य साझेदार देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा दिया जाए। अगर यह रणनीति बड़े स्तर पर सफल होती है तो अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रभाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। ईरान के लिए चीन पहले से ही एक बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार है और उसके तेल कारोबार में चीन की भूमिका काफी बड़ी है। ऐसे में अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए वैकल्पिक रास्ते बनाए रखने की कोशिश की है। यही वह जगह है जहां BRICS ईरान के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। हालांकि इसे अमेरिका की आर्थिक व्यवस्था को खत्म करने वाला कोई तत्काल और अंतिम कदम मानना सही नहीं होगा। BRICS के सभी सदस्य देशों के अपने-अपने आर्थिक और रणनीतिक हित हैं और कई मुद्दों पर उनके बीच पूरी तरह एक जैसी नीति नहीं है। इसके बावजूद समूह का बढ़ता प्रभाव ईरान को पश्चिमी देशों पर निर्भरता कम करने का एक विकल्प जरूर देता है। ईरान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अमेरिकी प्रतिबंधों से उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव को किस तरह लंबे समय तक संभाला जाए। तेल निर्यात उसकी अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और अमेरिका लगातार उन नेटवर्क पर कार्रवाई करता रहा है, जिनके जरिए ईरानी तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचता है। ऐसे में ईरान के लिए चीन और अन्य गैर-पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक रिश्ते मजबूत करना बेहद जरूरी हो जाता है। दूसरी तरफ ईरान सिर्फ आर्थिक मोर्चे पर ही अमेरिका को चुनौती नहीं दे रहा है। पश्चिम एशिया में उसकी रणनीतिक स्थिति और हॉरमुज जलडमरूमध्य का महत्व भी इस पूरे विवाद को और गंभीर बनाता है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और ऊर्जा कारोबार इस समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। इसलिए ईरान से जुड़ा कोई भी बड़ा तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि अमेरिका और ईरान की टकराहट का असर सिर्फ दोनों देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। अब असली सवाल यह है कि क्या ईरान BRICS और अपने दूसरे आर्थिक साझेदारों के सहारे अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव को लंबे समय तक झेल पाएगा। दूसरी तरफ अमेरिका के सामने भी चुनौती है कि वह ईरान पर दबाव बनाए रखते हुए चीन और रूस जैसे देशों के साथ उसके बढ़ते आर्थिक संबंधों को किस तरह प्रभावित कर पाएगा। आने वाले समय में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, तेल की बिक्री, वैकल्पिक बैंकिंग व्यवस्था और BRICS के वित्तीय संस्थानों की भूमिका इस संघर्ष की दिशा तय कर सकती है। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि अमेरिका और ईरान के बीच मुकाबला अब सिर्फ सैन्य ताकत का नहीं रहा। यह डॉलर, तेल, बैंकिंग, व्यापार और वैश्विक गठबंधनों की ताकत का भी मुकाबला बन चुका है और ईरान इस बदलते समीकरण में BRICS के सहारे अपने लिए नया रास्ता तलाश रहा है।

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