एक समय भारतीय मोबाइल बाजार में माइक्रोमैक्स, लावा, कार्बन और इंटेक्स जैसे देसी ब्रांड्स का दबदबा हुआ करता था। लेकिन चीन की कंपनियों की एंट्री के बाद बाजार का पूरा समीकरण बदल गया। शाओमी, वीवो और ओप्पो जैसे ब्रांड्स ने आक्रामक कीमतों, बेहतर तकनीक और मजबूत सप्लाई चेन के दम पर भारतीय कंपनियों को पीछे छोड़ दिया। अब करीब एक दशक बाद सरकार एक ऐसी बड़ी योजना लेकर आई है, जिससे भारतीय मोबाइल ब्रांड्स की किस्मत फिर बदलने की उम्मीद जगी है।
केंद्र सरकार ने मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए 62,500 करोड़ रुपये की बड़ी योजना तैयार की है। इसका मकसद सिर्फ भारत में विदेशी कंपनियों के लिए फोन असेंबल करवाना नहीं है, बल्कि देश की अपनी ऐसी कंपनियां तैयार करना है जो वैश्विक बाजार में सैमसंग और शाओमी जैसी कंपनियों को टक्कर दे सकें।
भारत पिछले दस वर्षों में मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में काफी तेजी से आगे बढ़ा है। देश में मोबाइल फोन का उत्पादन करीब 33 गुना बढ़ा है, जबकि मोबाइल फोन के निर्यात में लगभग 165 गुना की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यानी भारत अब सिर्फ एक बड़ा मोबाइल बाजार नहीं, बल्कि दुनिया के महत्वपूर्ण मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में भी अपनी जगह बना रहा है।
केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक, भारत को 2027 के मध्य तक अपना पहला मजबूत स्वदेशी स्मार्टफोन ब्रांड मिलने की उम्मीद है। सरकार की योजना में भारतीय कंपनियों को उत्पादन और बिक्री बढ़ाने के साथ-साथ रिसर्च एंड डेवलपमेंट और अपने खुद के डिजाइन पर काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
इस योजना की सबसे खास बात इसके इंसेंटिव हैं। भारतीय ब्रांड्स को बिक्री पर 5 फीसदी तक प्रोत्साहन दिया जाएगा। इसके अलावा भारतीय डिजाइन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए अतिरिक्त 3 फीसदी और देश में बने प्रमुख कंपोनेंट खरीदने पर 1.5 फीसदी तक अतिरिक्त प्रोत्साहन का प्रावधान बताया गया है। यानी सरकार चाहती है कि भारत सिर्फ मोबाइल फोन बनाने वाला देश न रहे, बल्कि मोबाइल की तकनीक और बौद्धिक संपदा का मालिक भी बने।
भारत पहले ही मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में बड़ी उपलब्धि हासिल कर चुका है। सरकार के अनुसार, देश में इस्तेमाल होने वाले करीब 99.2 फीसदी मोबाइल फोन अब भारत में ही बनाए जाते हैं। मोबाइल फोन का निर्यात भी 2014-15 के लगभग 1,500 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में करीब 2.59 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
इसी अवधि में देश में मोबाइल फोन का उत्पादन भी करीब 18,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 6.27 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत ने मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में कितनी बड़ी छलांग लगाई है। लेकिन सवाल अब भी यही है कि क्या भारत इसी मैन्युफैक्चरिंग ताकत के दम पर अपना कोई ग्लोबल स्मार्टफोन ब्रांड खड़ा कर पाएगा?
एक समय माइक्रोमैक्स भारतीय बाजार में सैमसंग को सीधी चुनौती देता था। 2015 के आसपास माइक्रोमैक्स, लावा, कार्बन और इंटेक्स जैसे भारतीय ब्रांड्स की बाजार हिस्सेदारी काफी मजबूत थी। लेकिन चीनी कंपनियों ने बड़े निवेश, मजबूत सप्लाई नेटवर्क, बेहतर कैमरा और दूसरी तकनीकों के साथ बेहद आक्रामक कीमतों पर फोन लॉन्च किए। धीरे-धीरे भारतीय कंपनियां प्रतिस्पर्धा में पिछड़ती चली गईं और उनकी संयुक्त हिस्सेदारी एक फीसदी से भी कम रह गई।
अब तस्वीर बदलने की उम्मीद इसलिए भी है क्योंकि भारत के पास वह मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम मौजूद है, जो एक दशक पहले नहीं था। लावा आज भी भारतीय बाजार में टिके रहने वाले प्रमुख घरेलू स्मार्टफोन ब्रांड्स में शामिल है। कंपनी डिस्प्ले मॉड्यूल, कैमरा पार्ट्स और पीसीबी जैसी तकनीकों में करीब 1,100 करोड़ रुपये का निवेश कर रही है।
इसके अलावा डिक्सन टेक्नोलॉजीज और माइक्रोमैक्स की पैरेंट कंपनी भगवती प्रोडक्ट्स जैसी भारतीय कंपनियां भी देश में बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग कर रही हैं। इसका मतलब है कि भारतीय कंपनियों के पास अब उत्पादन का आधार पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत है।
हालांकि, सिर्फ सरकारी प्रोत्साहन से किसी भारतीय ब्रांड का वैश्विक स्तर पर सफल होना आसान नहीं होगा। कंपनियों को कैमरा, चिपसेट, सॉफ्टवेयर, बैटरी, डिजाइन और यूजर एक्सपीरियंस जैसे क्षेत्रों में लगातार निवेश करना होगा। साथ ही कीमत और क्वालिटी के मामले में चीनी और दूसरे वैश्विक ब्रांड्स को कड़ी टक्कर देनी होगी।
लेकिन इस बार सबसे बड़ा फर्क यह है कि भारत के पास मैन्युफैक्चरिंग की मजबूत नींव तैयार हो चुकी है। अगर सरकार की 62,500 करोड़ रुपये की योजना सही तरीके से लागू होती है और भारतीय कंपनियां रिसर्च, डिजाइन और तकनीक पर फोकस करती हैं, तो आने वाले वर्षों में माइक्रोमैक्स और लावा जैसे देसी ब्रांड्स के लिए बाजार में वापसी का रास्ता खुल सकता है।
अब असली सवाल यही है—क्या भारत सिर्फ दुनिया का बड़ा मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग हब बनेगा, या फिर अगले कुछ वर्षों में उसका अपना कोई स्मार्टफोन ब्रांड भी दुनिया के बड़े बाजारों में अपनी पहचान बनाएगा?


