रूस और अमेरिका के बीच पुरानी तनातनी को लेकर रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का एक बयान फिर चर्चा में है। लावरोव ने उस दौर का जिक्र किया जब रूस की तरफ से NATO में शामिल होने की संभावना को लेकर सवाल उठाया गया था। उन्होंने बताया कि तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से पूछा था कि जब शीत युद्ध खत्म हो चुका है और सोवियत संघ का अस्तित्व नहीं रहा, तो रूस और पश्चिम के बीच दूरी बनाए रखने की जरूरत आखिर क्यों है। इसी संदर्भ में पुतिन ने NATO में शामिल होने की संभावना पर भी सवाल उठाया था।
लावरोव के मुताबिक, उस समय क्लिंटन की प्रतिक्रिया ऐसी थी, जिसे उन्होंने झिझक या असहजता के तौर पर देखा। रूस के विदेश मंत्री का दावा है कि पश्चिमी देशों ने रूस को कभी पूरी तरह बराबरी के साझेदार के रूप में स्वीकार नहीं किया। उनके अनुसार, पश्चिम रूस को एक ऐसे सहयोगी के रूप में देखना चाहता था, जो उसके तय किए हुए ढांचे के भीतर रहे।
लावरोव का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब रूस लगातार दुनिया में बदलते शक्ति संतुलन की बात करता रहा है। रूस का कहना है कि वैश्विक राजनीति अब केवल अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। भारत, चीन और ब्राजील जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और प्रभावशाली देशों की भूमिका लगातार बढ़ रही है और दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की तरफ बढ़ रही है।
रूसी पक्ष लंबे समय से BRICS जैसे मंचों को इसी बदलती वैश्विक व्यवस्था का उदाहरण बताता रहा है। भारत और चीन दोनों ही वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं, जबकि ब्राजील लैटिन अमेरिका की प्रमुख ताकतों में शामिल है। रूस का तर्क है कि आने वाले समय में वैश्विक फैसलों पर इन देशों और अन्य उभरती शक्तियों का प्रभाव और बढ़ेगा।
लावरोव के बयान का एक अहम हिस्सा रूस और NATO के रिश्तों से जुड़ा है। शीत युद्ध खत्म होने के बाद रूस और पश्चिम के बीच सहयोग की संभावनाएं जरूर बनी थीं, लेकिन समय के साथ दोनों पक्षों के रिश्ते लगातार तनावपूर्ण होते गए। NATO के विस्तार, यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था और रूस के पड़ोसी देशों को लेकर विवादों ने इस दूरी को और बढ़ाया।
रूस की ओर से अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि NATO का पूर्व की ओर विस्तार उसकी सुरक्षा के लिए खतरा है। वहीं अमेरिका और NATO का पक्ष रहा है कि गठबंधन में शामिल होना संबंधित देशों का अपना निर्णय है और NATO किसी देश के खिलाफ आक्रामक संगठन नहीं है। यही मतभेद पिछले कई दशकों में रूस और पश्चिम के बीच तनाव का बड़ा कारण रहे हैं।
अब जब वैश्विक राजनीति में अमेरिका, रूस और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है, ऐसे में लावरोव का यह बयान पुराने घटनाक्रम को एक नए नजरिए से पेश करता है। रूस यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि दुनिया की शक्ति संरचना बदल रही है और भविष्य में भारत, चीन, ब्राजील समेत कई बड़ी ताकतें वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करेंगी।
भारत के संदर्भ में रूस की यह सोच खास महत्व रखती है। भारत लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर चलता रहा है और अमेरिका, रूस तथा अन्य बड़ी शक्तियों के साथ अपने संबंधों को अलग-अलग स्तर पर आगे बढ़ाता रहा है। चीन के साथ भारत के रिश्तों में कई मतभेद हैं, लेकिन वैश्विक मंचों पर दोनों देश बहुध्रुवीय दुनिया और विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने जैसे मुद्दों पर कई बार एक जैसे विचार रखते हैं।
फिलहाल लावरोव का बयान अमेरिका और रूस के बीच पुराने विवाद को फिर सुर्खियों में ले आया है। उनका संदेश साफ है कि मॉस्को अब दुनिया को केवल पश्चिमी शक्ति के नजरिए से नहीं देखता और भारत, चीन तथा ब्राजील जैसी उभरती शक्तियों को भविष्य की वैश्विक व्यवस्था के अहम केंद्रों के रूप में देखता है। आने वाले वर्षों में यह बदलता शक्ति संतुलन अमेरिका और रूस समेत पूरी दुनिया की रणनीति को किस दिशा में ले जाएगा, इस पर सभी की नजरें रहेंगी।


