न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के भाषण के बाद भारत में सियासी बहस तेज हो गई है। भागवत ने अपने संबोधन में विविधता में एकता और भारतीय समाज में आपसी संवेदना की बात की, लेकिन उनके बयान पर कांग्रेस की ओर से सवाल उठाए गए हैं। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भागवत के भाषण पर तंज कसते हुए कई सवाल खड़े किए और पूछा कि विदेश की धरती पर विविधता और एकता की बात करने वाले आरएसएस प्रमुख भारत में इसी भावना को लेकर क्या रुख रखते हैं।
कपिल सिब्बल ने मोहन भागवत के भाषण पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनकी बातें सुनकर उन्हें एक पल के लिए लगा कि यह राहुल गांधी का भाषण है या आरएसएस प्रमुख का। सिब्बल का यह तंज सीधे तौर पर भागवत के उस संदेश पर था, जिसमें उन्होंने भारतीय समाज की विविधता को स्वीकार करने और अलग-अलग समुदायों के बीच एकता बनाए रखने की बात कही थी। सिब्बल ने सवाल किया कि अगर विविधता और आपसी सम्मान की यही भावना इतनी महत्वपूर्ण है, तो इसे भारत में भी उसी तरह क्यों नहीं अपनाया जाता?
सिब्बल ने विदेश और भारत के संदर्भ को जोड़ते हुए कहा कि अमेरिका में भारतीय समुदाय को एकता और विविधता का संदेश देना अच्छी बात है, लेकिन देश के भीतर भी यही सिद्धांत दिखाई देना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भारत में अलग-अलग धर्मों, समुदायों और विचारधाराओं के लोगों के प्रति भी उसी तरह की संवेदना दिखाई जाती है, जिसकी बात विदेश में मंच से की जाती है।
कांग्रेस नेता ने अपने बयान में मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं का भी जिक्र किया। उनका सवाल था कि जब भारत में किसी व्यक्ति या समुदाय के खिलाफ हिंसा की घटनाएं सामने आती हैं, तब समाज और राजनीतिक नेतृत्व का रवैया क्या होता है। सिब्बल ने इसी संदर्भ में भागवत के विदेश में दिए गए संदेश और भारत में होने वाली घटनाओं के बीच कथित अंतर को लेकर सवाल खड़े किए।
मोहन भागवत के भाषण को लेकर भाजपा और आरएसएस समर्थकों की ओर से अलग प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। समर्थकों का कहना है कि आरएसएस प्रमुख ने दुनिया के सामने भारतीय संस्कृति और विविधता में एकता का संदेश रखा। वहीं विपक्ष का तर्क है कि सिर्फ विदेश में भारतीय समाज की विविधता की बात करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि देश के भीतर भी सामाजिक सद्भाव और सभी समुदायों के अधिकारों को लेकर समान संदेश और व्यवहार दिखाई देना चाहिए।
यह पूरा विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मोहन भागवत का अमेरिका में दिया गया भाषण ऐसे समय में सामने आया है जब भारत में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को लेकर विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच लगातार बहस होती रहती है। भागवत के बयान को जहां उनके समर्थक व्यापक भारतीय दृष्टिकोण के रूप में देख रहे हैं, वहीं कपिल सिब्बल जैसे विपक्षी नेता इसे देश के भीतर के राजनीतिक और सामाजिक माहौल से जोड़कर सवाल उठा रहे हैं।
सिब्बल का बयान सामने आने के बाद अब राजनीतिक बहस का केंद्र यही सवाल बन गया है कि विविधता और एकता का संदेश सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मंचों तक सीमित रहना चाहिए या फिर देश के भीतर भी उसी भावना को व्यवहार में उतारा जाना चाहिए। विपक्ष इस मुद्दे को लेकर आरएसएस और भाजपा से सवाल कर रहा है, जबकि समर्थक भागवत के भाषण को भारत की विविध संस्कृति और एकता का संदेश बता रहे हैं।
फिलहाल मोहन भागवत के भाषण और कपिल सिब्बल की प्रतिक्रिया ने एक बार फिर देश की राजनीति में ‘विविधता में एकता’ के मुद्दे को चर्चा में ला दिया है। विदेश में दिया गया एक भाषण अब भारत में सियासी बयानबाजी का कारण बन चुका है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस के बीच और तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं।


