आज के समय में छोटी-मोटी बीमारी होने पर डॉक्टर के पास जाने के बजाय खुद से दवा लेना आम होता जा रहा है। सिरदर्द, बुखार, गले में दर्द या संक्रमण जैसे लक्षण दिखाई देने पर कई लोग बिना चिकित्सकीय सलाह के एंटीबायोटिक्स तक लेना शुरू कर देते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदत तत्काल राहत भले ही दे, लेकिन गलत या अनावश्यक तरीके से एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल स्वास्थ्य के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकता है।
हमारी प्रतिरोधक क्षमता और पेट में मौजूद गट माइक्रोबायोम के बीच गहरा संबंध है। गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट में बड़ी संख्या में ऐसे सूक्ष्मजीव मौजूद होते हैं, जिन्हें आमतौर पर गुड बैक्टीरिया कहा जाता है। ये शरीर की कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में भूमिका निभाते हैं और इम्यून सिस्टम के साथ भी उनका संबंध होता है। इसलिए पेट के माइक्रोबायोम का संतुलन बिगड़ने पर स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है।
खासकर ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल करते समय सावधानी बेहद जरूरी है। ये दवाएं बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया को खत्म करने के साथ-साथ शरीर में मौजूद कुछ उपयोगी बैक्टीरिया को भी प्रभावित कर सकती हैं। अगर एंटीबायोटिक्स का बार-बार या जरूरत के बिना इस्तेमाल किया जाए, तो गट माइक्रोबायोम का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है। इस स्थिति को मेडिकल भाषा में डिस्बायोसिस कहा जाता है।
हालांकि, यह समझना भी जरूरी है कि एंटीबायोटिक्स सीधे तौर पर हर व्यक्ति की इम्यूनिटी को स्थायी रूप से कमजोर कर देती हैं, ऐसा कहना सही नहीं होगा। समस्या मुख्य रूप से इनके अनावश्यक, गलत या बार-बार इस्तेमाल से जुड़ी है। गट बैक्टीरिया में होने वाले बदलावों का असर व्यक्ति की स्थिति और इस्तेमाल की गई दवा के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।
सबसे बड़ी चिंता एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी एएमआर को लेकर है। जब एंटीबायोटिक्स का गलत इस्तेमाल किया जाता है या डॉक्टर की सलाह के बिना दवा शुरू कर दी जाती है, तो बैक्टीरिया के ऐसे स्ट्रेन बच सकते हैं जिन पर वही दवा प्रभावी नहीं रहती। समय के साथ ये बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बन सकते हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञ एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को भविष्य की बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में गिनते हैं।
एक और बड़ी गलती है बीमारी ठीक महसूस होते ही डॉक्टर द्वारा निर्धारित एंटीबायोटिक का कोर्स अपनी मर्जी से रोक देना। ऐसा करने से इलाज प्रभावित हो सकता है और कुछ संक्रमणों में दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया के चयन का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए एंटीबायोटिक कितने दिन और किस मात्रा में लेनी है, इसका फैसला डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हर बुखार या संक्रमण में एंटीबायोटिक की जरूरत नहीं होती। सर्दी-जुकाम और फ्लू जैसी कई वायरल बीमारियों पर एंटीबायोटिक्स काम नहीं करतीं। ऐसे मामलों में बिना जरूरत एंटीबायोटिक लेने से फायदा मिलने के बजाय दस्त, पेट खराब होना, मतली या अन्य साइड इफेक्ट हो सकते हैं।
गट हेल्थ को बेहतर बनाए रखने के लिए संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली महत्वपूर्ण हैं। दही जैसे प्रोबायोटिक खाद्य पदार्थ कुछ लोगों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं, लेकिन इन्हें एंटीबायोटिक के नुकसान की निश्चित भरपाई करने वाला इलाज नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी बीमारी में सबसे जरूरी है कि दवा डॉक्टर की सलाह से ली जाए और एंटीबायोटिक को बिना जरूरत इस्तेमाल करने से बचा जाए।
विशेषज्ञों की चेतावनी का सीधा संदेश यही है कि Self-Medication को सामान्य आदत न बनाएं। खासकर एंटीबायोटिक्स ऐसी दवाएं हैं जिन्हें अपनी मर्जी से शुरू करना, बदलना या बंद करना नुकसानदेह हो सकता है। आज थोड़ी सावधानी बरतना न सिर्फ आपकी सेहत के लिए जरूरी है, बल्कि भविष्य में संक्रमणों के प्रभावी इलाज को बचाए रखने के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।

