कभी अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम कराने और युद्धविराम में मध्यस्थ की भूमिका निभाने का दावा करने वाला पाकिस्तान अब खुद एक बड़ी कूटनीतिक मुश्किल में फंसता नजर आ रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने इस्लामाबाद के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि वह आखिर किस तरह दोनों पक्षों के साथ अपने रिश्तों को संतुलित रखे। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने मौजूदा स्थिति को ‘रस्सी पर चलने’ जैसा बताया है।
ख्वाजा आसिफ ने अमेरिका और ईरान के बीच भविष्य में होने वाली बातचीत में पाकिस्तान की संभावित भूमिका पर बात करते हुए कहा कि इस्लामाबाद के ईरान के साथ-साथ सभी खाड़ी देशों के साथ ‘भाई जैसे संबंध’ हैं। उन्होंने इन रिश्तों को पाकिस्तान के लिए बेहद अहम बताया। उनके बयान से साफ है कि पाकिस्तान मौजूदा तनाव के बीच किसी भी पक्ष के खिलाफ खुलकर जाने से बचना चाहता है।
दरअसल, ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी देश है और दोनों देशों के बीच लंबे समय से राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े संबंध रहे हैं। दूसरी तरफ खाड़ी के देश भी पाकिस्तान के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। बड़ी संख्या में पाकिस्तानी नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं और इन देशों से पाकिस्तान को बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भी मिलती है। ऐसे में खाड़ी देशों के साथ रिश्ते खराब करना इस्लामाबाद के लिए आर्थिक रूप से भारी पड़ सकता है।
पाकिस्तान के अमेरिका के साथ भी पुराने रणनीतिक और सुरक्षा संबंध रहे हैं। यही वजह है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने की स्थिति में इस्लामाबाद के लिए संतुलन बनाना बेहद मुश्किल हो जाता है। अगर पाकिस्तान अमेरिका के करीब जाता है तो ईरान के साथ उसके रिश्तों पर असर पड़ सकता है और अगर वह तेहरान के पक्ष में खड़ा होता है तो वॉशिंगटन तथा खाड़ी देशों के साथ उसके समीकरण बिगड़ सकते हैं।
इससे पहले पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम कराने में अपनी मध्यस्थता को लेकर काफी सक्रियता दिखाई थी। इस्लामाबाद ने बातचीत और युद्धविराम की कोशिशों में अपनी भूमिका को कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर पेश किया था। लेकिन अब दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने से पाकिस्तान के सामने अपनी उस भूमिका को बनाए रखने की चुनौती है।
ख्वाजा आसिफ का ‘रस्सी पर चलने’ वाला बयान पाकिस्तान की इसी स्थिति को दर्शाता है। इस्लामाबाद एक तरफ ईरान के साथ अपने करीबी संबंधों को बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ खाड़ी देशों के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को भी सुरक्षित रखना चाहता है। इसके अलावा अमेरिका के साथ रिश्तों को पूरी तरह खराब करने का जोखिम भी पाकिस्तान नहीं उठा सकता।
पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इस पूरे विवाद में अपनी स्थिति को कितना तटस्थ रख पाता है। अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ता है तो पाकिस्तान पर दोनों पक्षों की ओर से दबाव बढ़ने की संभावना भी रहेगी। ऐसे में इस्लामाबाद को बेहद सावधानी से अपनी विदेश नीति आगे बढ़ानी होगी।
फिलहाल पाकिस्तान खुद को बातचीत और कूटनीति के समर्थक के तौर पर पेश कर रहा है। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव उसके लिए आसान स्थिति नहीं है। एक तरफ पड़ोसी ईरान है, दूसरी तरफ खाड़ी देशों के साथ अहम रिश्ते हैं और तीसरी ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक समीकरण। ऐसे में पाकिस्तान के सामने असली परीक्षा यही है कि वह इन सभी रिश्तों को बचाते हुए अपनी कूटनीतिक भूमिका कितनी प्रभावी ढंग से निभा पाता है।


