मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव अब एक बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। जंग का असर अब सिर्फ ईरान, इजराइल और यमन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी आंच सऊदी अरब के ऊर्जा नेटवर्क और दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों तक पहुंच गई है। यमन में हूती विद्रोहियों की बढ़ती गतिविधियों और सऊदी अरब की अहम तेल पाइपलाइन पर ड्रोन हमले ने पूरे क्षेत्र में चिंता बढ़ा दी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मिडिल ईस्ट का यह संघर्ष अब दुनिया के तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी अपनी चपेट में लेने वाला है?
बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक माना जाता है। यह लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है। यूरोप और एशिया के बीच आने-जाने वाले जहाजों के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। इसी रास्ते से बड़ी मात्रा में तेल, गैस और अन्य सामान की आवाजाही होती है। ऐसे में इस इलाके में किसी भी तरह का सैन्य तनाव वैश्विक सप्लाई चेन के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
यमन में हूती विद्रोहियों की गतिविधियों ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मोखा क्षेत्र और बाब-अल-मंदेब के आसपास हूतियों की मौजूदगी को लेकर लगातार तनाव बना हुआ है। अगर इस समुद्री इलाके में जहाजों की आवाजाही पर खतरा बढ़ता है, तो कंपनियों को वैकल्पिक लंबे समुद्री रास्तों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। इससे जहाजों का समय और ईंधन खर्च दोनों बढ़ेंगे और इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है।
इसी बीच सऊदी अरब की एक बेहद अहम तेल पाइपलाइन को ड्रोन हमले में निशाना बनाए जाने की खबर सामने आई है। यह पाइपलाइन सऊदी अरब के पूर्वी हिस्से में मौजूद तेल क्षेत्रों को लाल सागर के तट पर स्थित यानबू बंदरगाह से जोड़ती है। हमले के बाद पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। इस हमले ने सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ उसकी तेल निर्यात क्षमता को लेकर भी चिंता पैदा कर दी है।
इस पाइपलाइन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सऊदी अरब को होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी निर्भरता कम करने में मदद करती है। फारस की खाड़ी से निकलने वाले तेल के लिए होर्मुज बेहद अहम समुद्री रास्ता है। लेकिन अगर वहां किसी कारण से तनाव बढ़ता है या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो सऊदी अरब लाल सागर के रास्ते अपने तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचा सकता है।
यही वजह है कि इस पाइपलाइन को सऊदी अरब के लिए एक वैकल्पिक ऊर्जा मार्ग माना जाता है। लेकिन अब इसी रास्ते को निशाना बनाए जाने से सवाल उठ रहे हैं कि अगर समुद्री मार्गों के साथ-साथ जमीन पर मौजूद ऊर्जा ढांचे पर भी हमले बढ़ गए तो वैश्विक तेल आपूर्ति का क्या होगा।
ड्रोन हमले के बाद पाइपलाइन को बंद करने का फैसला एहतियाती तौर पर लिया गया है। नुकसान का आकलन और मरम्मत का काम भी महत्वपूर्ण हो गया है। हालांकि पाइपलाइन का अस्थायी रूप से बंद होना अपने आप में वैश्विक तेल संकट का संकेत नहीं है, लेकिन अगर ऐसी घटनाएं लगातार होती हैं तो बाजार में अनिश्चितता तेजी से बढ़ सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों पर भी पड़ सकता है। मिडिल ईस्ट से तेल की सप्लाई में बाधा आती है तो कच्चे तेल की कीमत बढ़ सकती है। इसके बाद पेट्रोल, डीजल, परिवहन और कई दूसरी चीजों की लागत पर भी दबाव पड़ सकता है।
अब निगाह इस बात पर है कि यमन में हूतियों की गतिविधियां आगे कितना बढ़ती हैं और सऊदी अरब इसका जवाब किस तरह देता है। अगर लाल सागर, बाब-अल-मंदेब और होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग एक साथ तनाव की चपेट में आते हैं, तो यह सिर्फ मिडिल ईस्ट का क्षेत्रीय संकट नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है।


