पुणे में सोमवार से गणेशोत्सव की शुरुआत हो गई और शहर में भगवान गणेश की भक्ति का रंग दिखाई देने लगा। अलग-अलग गणपति मंडलों ने पारंपरिक शोभायात्राओं के साथ उत्सव की शुरुआत की। शहर के प्रसिद्ध ‘मानाचे पंच गणपति’ समेत कई मंडलों में विधि-विधान के साथ भगवान गणेश की प्राण प्रतिष्ठा की गई। लेकिन इस बार गणेशोत्सव में एक बड़ा बदलाव नजर आया। प्रशासन की गाइडलाइन के चलते कई जगहों पर DJ और बड़े साउंड सिस्टम की आवाज नहीं सुनाई दी।
हालांकि DJ बंद होने के बावजूद शहर में शोर पूरी तरह बंद नहीं हुआ। गणपति उत्सव के पहले ही दिन कई जगहों पर ध्वनि स्तर 90 डेसिबल से ज्यादा दर्ज किया गया। यानी प्रशासन की ओर से तेज आवाज वाले DJ और बड़े साउंड सिस्टम पर रोक के बावजूद सड़क पर मौजूद भीड़, पारंपरिक वाद्य यंत्रों और दूसरे ध्वनि स्रोतों के कारण शोर का स्तर काफी ऊंचा रहा।
पुणे में गणेशोत्सव का अपना अलग ही महत्व है। यहां गणपति उत्सव सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि शहर की सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा माना जाता है। हर साल बड़ी संख्या में गणपति मंडल अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करते हैं और भक्त बड़ी संख्या में इन आयोजनों में शामिल होते हैं। इस दौरान ढोल-ताशे और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज पूरे शहर में सुनाई देती है।
इस बार प्रशासन ने ध्वनि प्रदूषण को लेकर विशेष दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कोशिश यह है कि धार्मिक उत्सव पूरे उत्साह के साथ मनाया जाए, लेकिन तेज आवाज से लोगों को परेशानी न हो। इसी वजह से कई जगहों पर DJ और बड़े साउंड सिस्टम का इस्तेमाल नहीं किया गया। इसके बावजूद जब ध्वनि स्तर की जांच हुई तो कुछ स्थानों पर आंकड़े 90 डेसिबल के पार पहुंच गए।
यह स्थिति एक अहम सवाल खड़ा करती है। अगर DJ बंद है और बड़े साउंड सिस्टम का इस्तेमाल नहीं हो रहा, तो आखिर इतना ज्यादा शोर कहां से आ रहा है? दरअसल, गणपति की शोभायात्राओं में बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। ढोल-ताशे जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की आवाज भी काफी तेज हो सकती है। इसके अलावा सड़क पर भीड़ और दूसरे ध्वनि स्रोत मिलकर कुल शोर का स्तर बढ़ा देते हैं।
हालांकि गणेशोत्सव के दौरान पारंपरिक ढोल-ताशे का अपना खास सांस्कृतिक महत्व है। पुणे की गणपति परंपरा में इनका इस्तेमाल लंबे समय से होता आया है। इसलिए चुनौती यह है कि परंपरा और ध्वनि नियंत्रण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। प्रशासन के लिए भी यह आसान काम नहीं है, क्योंकि एक तरफ लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाएं जुड़ी हैं, तो दूसरी तरफ ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करना भी जरूरी है।
पहले दिन के रियलिटी चेक से यह जरूर साफ हुआ कि केवल DJ और बड़े साउंड सिस्टम को बंद कर देना पर्याप्त नहीं है। अगर कुल ध्वनि स्तर निर्धारित सीमा से ऊपर जा रहा है तो दूसरे ध्वनि स्रोतों पर भी ध्यान देना होगा। इसके लिए आयोजन स्थलों पर लगातार निगरानी और ध्वनि स्तर की नियमित जांच जरूरी हो सकती है।
गणेशोत्सव अभी शुरू ही हुआ है और आने वाले दिनों में शहर में अलग-अलग मंडलों की शोभायात्राएं और कार्यक्रम और बढ़ेंगे। ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि उत्सव का माहौल भी बना रहे और ध्वनि प्रदूषण को भी नियंत्रित किया जा सके।
वहीं भक्तों और गणपति मंडलों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे प्रशासन की गाइडलाइन का पालन करें। उत्सव की खुशी और भक्ति को तेज आवाज से जोड़ना जरूरी नहीं है। पारंपरिक तरीके से उत्सव मनाते हुए भी ध्वनि प्रदूषण को कम किया जा सकता है।
पुणे में गणपति उत्सव के पहले दिन की तस्वीर कुछ ऐसी रही—DJ की आवाज भले ही कई जगहों पर गायब रही, लेकिन शोर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। 90 डेसिबल से ज्यादा ध्वनि स्तर की रिपोर्ट ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि आने वाले दिनों में गाइडलाइन का पालन कितनी प्रभावी तरीके से कराया जाता है। अब देखना होगा कि प्रशासन और गणपति मंडल मिलकर उत्सव की परंपरा और ध्वनि नियंत्रण के बीच कितना बेहतर संतुलन बना पाते हैं।


