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ब्रिटेन के बंटने का बढ़ा खतरा? स्कॉटलैंड-वेल्स-नॉर्दर्न आयरलैंड की अलग होने की मांग से मची हलचल

यूनाइटेड किंगडम यानी ब्रिटेन को लेकर एक बार फिर ऐसी राजनीतिक बहस तेज हो गई है, जिसने पूरे यूरोप का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है। सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले समय में यूनाइटेड किंगडम के चार हिस्से हो सकते हैं? स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड में ब्रिटेन से अलग होने या अपनी राजनीतिक स्थिति को बदलने की मांग समय-समय पर सामने आती रही है। हालांकि इसे तत्काल ब्रिटेन के टूटने की पक्की खबर मानना सही नहीं होगा, लेकिन अलगाव की राजनीति ने लंदन के सामने एक गंभीर चुनौती जरूर खड़ी कर रखी है।

यूनाइटेड किंगडम चार हिस्सों से मिलकर बना है—इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड। इनमें से स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता का मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चित रहा है। स्कॉटलैंड में पहले भी स्वतंत्रता को लेकर जनमत संग्रह हो चुका है। इसके बावजूद वहां स्वतंत्रता समर्थक राजनीति पूरी तरह खत्म नहीं हुई और समय-समय पर दोबारा जनमत संग्रह की मांग उठती रही है।

उत्तरी आयरलैंड का मामला और भी संवेदनशील है। यहां लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि क्या उत्तरी आयरलैंड को यूनाइटेड किंगडम का हिस्सा बने रहना चाहिए या आयरलैंड गणराज्य के साथ एकीकरण होना चाहिए। ब्रिटेन और आयरलैंड के बीच संबंधों तथा उत्तरी आयरलैंड की राजनीतिक स्थिति को लेकर गुड फ्राइडे समझौते के बाद काफी बदलाव आया, लेकिन आयरिश एकीकरण का मुद्दा अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

वेल्स में भी स्वतंत्रता समर्थक आवाजें मौजूद हैं, हालांकि वहां की स्थिति स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड से अलग है। वेल्स में भी एक वर्ग ज्यादा स्वायत्तता या स्वतंत्रता की मांग करता रहा है। यही वजह है कि यूनाइटेड किंगडम की एकता को लेकर बहस सिर्फ एक इलाके तक सीमित नहीं है।

इस बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से आयरलैंड के एकीकरण को लेकर टिप्पणी ने भी इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है। हालांकि किसी बाहरी नेता का बयान अपने आप में आयरलैंड के एकीकरण की प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकता। इसके लिए संबंधित क्षेत्रों में राजनीतिक और संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करना होगा।

सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग तरह के दावे तेजी से वायरल हो रहे हैं। कुछ लोग इसे ब्रिटेन के जल्द ही चार टुकड़ों में टूटने के तौर पर पेश कर रहे हैं। लेकिन वास्तविक स्थिति इससे कहीं ज्यादा जटिल है। किसी क्षेत्र की स्वतंत्रता या यूनाइटेड किंगडम से अलग होने के लिए केवल राजनीतिक इच्छा काफी नहीं होती। इसके लिए संवैधानिक प्रक्रिया, जनमत और संबंधित सरकारों के बीच सहमति जैसे कई महत्वपूर्ण चरणों से गुजरना पड़ सकता है।

ब्रिटेन की राजनीति में इन मांगों का असर जरूर दिखाई देता है। स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता, उत्तरी आयरलैंड का भविष्य और वेल्स की अधिक स्वायत्तता जैसे मुद्दे चुनावों और राजनीतिक बहसों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अगर अलगाववादी दलों का प्रभाव बढ़ता है, तो लंदन की सरकार पर संवैधानिक बदलावों को लेकर दबाव भी बढ़ सकता है।

भारत में भी इस खबर को लेकर सोशल मीडिया पर अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। खासकर ब्रिटेन के औपनिवेशिक इतिहास का जिक्र करते हुए कुछ लोग इसे भारत के अतीत से जोड़ रहे हैं। सोशल मीडिया पर ‘फर्स्ट इन माय ब्लड लाइन’ जैसे ट्रेंड के जरिए लोग यह कह रहे हैं कि वे उस ब्रिटेन में संभावित राजनीतिक बदलाव देख रहे हैं, जिसने कभी भारत पर शासन किया था। हालांकि ऐसी प्रतिक्रियाएं मुख्य रूप से सोशल मीडिया की भावनात्मक और राजनीतिक प्रतिक्रिया हैं, इन्हें वास्तविक राजनीतिक घटनाक्रम का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

भारत और ब्रिटेन के बीच आज भी व्यापार, शिक्षा, रोजगार और प्रवासन के मजबूत संबंध हैं। इसलिए ब्रिटेन की राजनीतिक स्थिरता में होने वाला कोई बड़ा बदलाव भारतीय नागरिकों और वहां रहने वाले भारतीय मूल के लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन फिलहाल ब्रिटेन के तत्काल चार हिस्सों में टूटने की बात को निश्चित परिणाम के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी।

असल तस्वीर यह है कि यूनाइटेड किंगडम के भीतर राष्ट्रीय पहचान, स्वायत्तता और स्वतंत्रता को लेकर बहस लगातार जारी है। स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड इस बहस के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र हैं, जबकि वेल्स में भी स्वतंत्रता समर्थक आवाजें मौजूद हैं। अब आने वाले वर्षों में राजनीतिक परिस्थितियां किस दिशा में जाती हैं, यह तय करेगा कि यूनाइटेड किंगडम की मौजूदा संरचना कितनी मजबूत रहती है या उसमें कोई बड़ा संवैधानिक बदलाव देखने को मिलता है।

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